मुहब्बत ने सब को किनारा दिया है
किसी शख़्स का यूँ सहारा दिया है
जिसे मानता है ये सारा ज़माना
मुक़द्दस ये रिश्ता भी प्यारा दिया है
हज़ारों हैं ग़म भी ज़माने में लेकिन
किसी को ये ग़म भी दोबारा दिया है
अगर बात क़िस्मत की आए जो मुझ पर
मुझे ये वतन सब से न्यारा दिया है
अगर बात सीधी चुभी हो कभी तो
ये नफ़रत को किस ने इशारा दिया है
यूँ माँ की नज़र में सभी हैं बराबर
घरों का ये झगड़ा हमारा दिया है
— Naviii dar b dar















