"मेरे ख़्वाब"
है अधूरी सी ज़िन्दगी
यूँ पास कोई हमराह नहीं
चाह सब कुछ पाने की मगर
दिल फिर भी गुमराह नहीं
काश ये राह मुकम्मल हो जाए कभी
कुछ ख़्वाब मेरे भी हैं
अपने जीवन की उलझनों को
दरकिनार कैसे कर लूँ
ख़ुद को यूँ किसी दिल में
गिरफ़्तार कैसे कर लूँ
मैं वो मौज हूँ साहिल पास नहीं जिस के
वो ना-उम्मीद हूँ कोई आस नहीं जिस के
काश ये ख़्वाहिशें परवाज़ बन जाएँ कभी
कुछ ख़्वाब मेरे भी हैं
ये दिल भी अजीब सा क्यूँ है
वो पराया ही सही पर क़रीब सा क्यूँ है
कश्मकश में हूँ 'नवी' कि क्या जवाब दूँ
मन में आता वो सवाल फ़रेब सा क्यूँ है
वो चंद लफ़्ज़ों की ख़ामोशी आग़ाज़ बन जाए कभी
कुछ ख़्वाब मेरे भी हैं















