"इंसानियत"
क़ीमत नहीं है अब
इंसानों में इंसानों की
बस्तियाँ बन गई है अब
जुर्म के शैतानों की
चार पैसों में क़त्ल
पेशा हो गया अब इनका
ख़ुशामद हो रही है फिर भी
इन अस्मत के हैवानों की
जिन की शह पर ये
इंसानियत का गला घोटते हैं
फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है
ऐसे हुक्मरानों की
वो ख़ून चूसने में
कोई कसर नहीं छोड़ते
ख़्वाहिश रखते हैं वो
ऊँचे आसमानों की
'नवी' अपने सितारे
गर्दिशों में ही सही
इंसानियत ज़िंदा रखी है
हम ने उसूलों और ईमानों की
— Naviii dar b dar















