"भोपाल"
बहुत बरस पहले की एक वो बात
निगली कितनी ज़िन्दगियाँ चंद पलों की एक रात
क्या बच्चे क्या जवाँ
बिछड़ गए न जाने कहाँ
थी जो कभी सुहागिन
आज बन गई थी अभागिन
हर तरफ़ था बेबसी का नज़ारा
क्या था मेरा क्या तुम्हारा
हाथों में वो बच्चे मानो
चैन की नींद सो रहे हों
हर तरफ़ चित्कारें
मानो अपनो को खो रहे हों
मेहँदी जो हाथों से उतरी भी न थी
अश्कों से मानों ख़ुद को भिगो रहे हों
था कैसा वो भयानक मंज़र
ज़मीं ख़ुद हो गई थी बंजर
रोने लगे थे हर जज़्बात
बदल गए चंद पलों में हालात
बहुत बरस पहले की एक वो बात
निगली कितनी ज़िन्दगियाँ चंद पलों की एक रात
था कैसा वो हर एक पल सदमों भरा
थे हर तरफ़ सह
में लोग
नज़रें व्याकुल मन अधमरा
किस शब्दों में बयाँ करूँ वो हालात
जब अपने खोते चले गए
मौत की आग़ोश में सोते चले गए
वो कैसी हवा चली थी ज़हर भरी
वो एक भयानक रात थी क़हर भरी
रूह काँप उठती है मेरी वो मंज़र सोच कर
दुनिया सभी की उजड़ी थी जो थी हरी भरी
सोचता हूँ 'नवी' इल्ज़ाम किस को दूँ
इंतक़ाम किस से लूँ
मैं यूँ ही वक़्त को कोसता रहा
आँखों में थी नमी
गहरी साँस लिए सोचता रहा
हे ऊपरवाले रहमत अता कर हर इंसान पर
इंसानियत ज़िंदा रहे हर अंजाम पर
मज़हबों में फ़र्क न लाए कोई कहीं
यक़ीन करें उस अल्लाह उस भगवान पर
शामिल है 'नवी' उस हर ग़म में
जिस ने खोया अपना लाल
वो टीस अभी भी मिटी नहीं
जिस का दंश अब भी झेल रहा भोपाल















