ये ख़्वाबों की दुनिया बसाए हैं हम भीमुहब्बत ज़रा आज़माए हैं हम भीसजाए तो कैसे सजाए कोई ख़्वाबयहाँ मुफ़लिसी के सताए हैं हम भी— Naviii dar b dar