"तन्हाई"
एक अकेली तन्हा सी गली
जहाँ अब भी है बसेरा मेरा
एक कच्चे ईंटों की इमारत
जहाँ सफ़हे पर लिखी इबारत
कहने को उस घर का तंग दरवाज़ा
आने जाने वालों के लिए वही तर-ओ-ताज़ा
कई क़िस्से दफ़्न उस काली रौशनाई में
हम भी जी रहे इस ग़म-ए-तन्हाई में
वो शीशे टूटी खिड़कियों के
जैसे चुभते गुलाब पंखुड़ियों के
वो रात बे रात जागना अपना
वो ख़ाली वक़्त में देखना सपना
कुछ हम सेाए बस अपने जैसे
ख़ामोश या बेबाक सपने जैसे
यूँ ही ज़िंदगी की बातें बहुत हैं
कभी फ़ुर्सत में सुनो ये रातें बहुत हैं
— Naviii dar b dar















