Madan Mohan Danish

Madan Mohan Danish

@madan-mohan-danish

Madan Mohan Danish shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Madan Mohan Danish's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

क्यूँँ ज़रूरी है किसी के पीछे पीछे हम चलें जब सफ़र अपना है तो अपनी रवानी चाहिए — Madan Mohan Danish
मुहब्बत रतजगे आवारागर्दी ज़रूरी काम सारे हो रहे हैं — Madan Mohan Danish
इल्म जब होगा किधर जाना है हाए तब तक तो गुज़र जाना है — Madan Mohan Danish
मुझे अब आइनों की क्या ज़रूरत मैं अपने साथ अब रहने लगा हूँ — Madan Mohan Danish
तअल्लुक़ में नया इतना हुआ है वो मेरा नाम लेने लग गया है — Madan Mohan Danish
हम अपने दुख को गाने लग गए हैं मगर इस में ज़माने लग गए हैं — Madan Mohan Danish
मैं जो भी उल्टा-सीधा सोचता हूँ कहीं ऐसा न हो सुनता हो कोई — Madan Mohan Danish
है दुख तो कह दो किसी पेड़ से परिंदे से अब आदमी का भरोसा नहीं है प्यारे कोई — Madan Mohan Danish
पत्थर पहले ख़ुद को पत्थर करता है उस के बा'द ही कुछ कारीगर करता है — Madan Mohan Danish
मैं उसे वो मुझ को समझाता रहा पर तअल्लुक़ फिर भी मुरझाता रहा — Madan Mohan Danish
पत्थर पहले ख़ुद को पत्थर करता है उस के बा'द ही कुछ कारीगर करता है — Madan Mohan Danish
मुसलसल तजरबों का है नतीजा मैं दरया से किनारा हो गया हूँ — Madan Mohan Danish
मुझे अपना किनारा कम था 'दानिश' बढ़ा ली मैं ने फिर गहराई अपनी — Madan Mohan Danish
धूप भी आराम करती थी जहाँ अपना ऐसी छाँव से नाता रहा — Madan Mohan Danish
'दानिश' यूँँ तस्लीम नहीं करती दुनिया अपने आप को साबित करना पड़ता है — Madan Mohan Danish
वरना बे-मौत ही मर जाएँगे सारे किरदार एक इनकार ज़रूरी है कहानी के लिए — Madan Mohan Danish
ये नादानी नहीं तो क्या है 'दानिश' समझना था जिसे समझा रहा हूँ — Madan Mohan Danish
मेरी हर गुफ़्तगू ज़मीं से रही यूँँ तो फ़ुर्सत में आसमान भी था — Madan Mohan Danish
तुम्हें ये दुनिया कभी फूल तो नहीं देगी मिले हैं काँटे तो काँटों को ही गुलाब करो — Madan Mohan Danish
मंज़िलें आती जाती रहती हैं किस लिए राह में रुका जाए — Madan Mohan Danish

Ghazal

आधी आग और आधा पानी हम दोनों जलती-बुझती एक कहानी हम दोनों मंदिर मस्जिद गिरिजा-घर और गुरुद्वारा लफ़्ज़ कई हैं एक मआ'नी हम दोनों रूप बदल कर नाम बदल कर आते हैं फ़ानी हो कर भी ला-फ़ानी हम दोनों ज्ञानी ध्यानी चतुर सियानी दुनिया में जीते हैं अपनी नादानी हम दोनों आधा आधा बाँट के जीते रहते हैं रौनक़ हो या हो वीरानी हम दोनों नज़र लगे ना अपनी जगमग दुनिया को करते रहते हैं निगरानी हम दोनों ख़्वाबों का इक नगर बसा लेते हैं रोज़ और बन जाते हैं सैलानी हम दोनों तू सावन की शोख़ घटा में प्यासा बन चल करते हैं कुछ मन-मानी हम दोनों इक-दूजे को रोज़ सुनाते हैं 'दानिश' अपनी अपनी राम-कहानी हम दोनों — Madan Mohan Danish