दिल ख़ुश-गवार भी है तिरा बे-क़रार भी

कुछ कुछ तो लग रहा है हमें उस्तुवार भी

हरदम उन्हीं के रहते हो घर में घुसे हुए
ऊपर से बन रहे हो बड़े नाक-दार भी

करता हूँ दो शिकार मैं तो एक तीर से
फ़न गीतकार भी है मिरा हुस्न-कार भी

तुम ने नहीं कहा था जहाँ छोड़ दे अभी
ऊपर से कर रहे हो मिरा इंतिज़ार भी

तुम लोग कह रहे हो भला आदमी उसे
मुझ को नज़र से लग रहा है 'ऐब-दार भी

मुझ पर ही मेरी जान का इल्ज़ाम धर दिया
ऊपर से बोलते हो मुझे ग़म-गुसार भी

हरदम नमक लगाना ग़रीबों के ज़ख़्म पर
ये तेरा काम-काज है और रोज़गार भी

— Prashant Kumar

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