Prashant Kumar

Top 10 of Prashant Kumar

    जिसको देना हो उसको दे दो आज़ादी
    मुझको अच्छी लगती है अपनी बर्बादी

    बेटा हाकिम है वकील बहू मैं भी मुंसिफ़
    नाती मुज़रिम क्या क़िस्मत है बे-औलादी

    तरबूज़ में चाक़ू मार या चाक़ू पे तरबूज़
    तुझको ही फटना है मैं तो हूँ फ़ौलादी

    पिछली बार आए तो सब में वीराना था
    अब दिन के दिन ही बढ़ती जाए आबादी

    तुम कुछ भी करे कोई रोको मत करने दो
    याँ सब की है अब अपनी अपनी आज़ादी
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    लेकर के मोहब्बत में मिरा नाम सर-ए-आम
    अब तुम भी मचाने लगे कोहराम सर-ए-आम

    मैंने तो सुनाया था भला हाल नज़र से
    पर वो तो लगाने लगे इल्ज़ाम सर-ए-आम

    है उम्र किताबों की सुनो प्रेम पुजारी
    बेचोगे पढ़ोगे नहीं तो आम सर-ए-आम

    डरते हैं किसी से न वो दबते हैं किसी से
    देते हैं मोहब्बत का भी पैग़ाम सर-ए-आम

    मैं थक सा गया दर्द ज़माने के उठाकर
    हो जाए यहीं ज़िंदगी की शाम सर-ए-आम

    मैं तो कभी भी घर से निकलता भी नहीं हूँ
    और तुमने मुझे कर दिया बदनाम सर-ए-आम
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    जब तक है सुनो साँस तभी तक ये जहाँ है
    फिर बाद में क्या किसको ख़बर कौन कहाँ है

    जो शख़्स ज़माने में अगर झुक के रहा है
    क़दमों में उसी के तो अरे सारा जहाँ है

    कोई भी मोहब्बत का अभी ज़िक्र न करना
    क्यूँ पास मिरे बैठा हुआ सारा जहाँ है

    ले काम से पहले ही सभी ज़ाफ़ गए हैं
    अब आज के इंसान में वो जान कहाँ है

    मेहमान हैं दो दिन के सभी जाएँगे इक दिन
    कुछ और नहीं भाई यही उम्र-ए-रवाँ है
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    किसी का दिल ही मिल जाए हमारी बात कर लेना
    नहीं मिलता हो फिर हमको तुम अपने साथ कर लेना

    मोहब्बत में भी देखो अब बहुत बेरोज़गारी है
    जगह जैसे ही खाली हो हमारी बात कर लेना

    अगर ये बात है तो फिर जहाँ चाहे बुला लेना
    तुम्हारा मन करे जब भी कि दो दो हाथ कर लेना

    बहुत मासूम सा है वो अरे अब छोड़ दो उसको
    तुम्हें जो कुछ भी करना है हमारे साथ कर लेना

    अरे अब छूट मिलती है मोहब्बत के भी सौदे में
    अगर अब की वो मिल जाए तो पक्की बात कर लेना

    जहाँ भी मन करेगा तुम वहाँ रोओगे ये थोड़ी
    ज़माना छोड़कर तुम तो कहीं बरसात कर लेना
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    मौत तू ही गले लगा ले आ
    इस ज़माने में कौन है अपना

    फ़र्क है इल्म में तिरे मेरे
    तू पढ़े है किताब मैं दुनिया

    फ़र्क है तेरे मेरे नश्शे में
    तू पिए जाम मैं ग़म-ए-दुनिया

    फ़र्क है परवरिश में तेरी मिरी
    तू रहा घर मैं साग़र-ओ-मीना

    बे-वजह ही किसी पे दोष धरें
    ज़िंदगी ने किया हमें रुस्वा
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    नेक़ी के रास्ते कि बदी से सने लगे
    जब से दलील-बाज़ लगाने गले लगे

    खाली क़लम को जेब पे कल क्या लगा दिया
    अनपढ़ गँवार लोगों के सीने तने लगे

    कोई ख़ता नहीं थी मिरी जान बूझकर
    वो आए और झोपड़े को फूँकने लगे

    बरसात तो कहीं भी नहीं दूर दूर तक
    फिर क्यूँ तिरे दयार सभी सूखने लगे

    घिन आ रही थी शायद उने हाल देखकर
    करके निगाह मेरी तरफ़ थूकने लगे

    ऐसा नहीं कि शख़्स कोई जानता नहीं
    सब जानते हैं फिर भी मुझे घूरने लगे
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    बेवफ़ा हैं तो दामन बचा लें
    वरना जूड़े में हमको सजा लें

    गर बनाना है दूल्हा बना लें
    वरना हमसे वो दामन छुड़ा लें

    जो हुआ सो हुआ उनसे बोलो
    मेरे कूचे से दूरी बना लें

    बारिश-ए-संग का है ये मौसम
    हुस्न कह दो ज़मीं में छुपा लें

    छोड़ दे जब सर-ए-राह दुनिया
    उनसे कहना कि हमको बुला लें

    ज़िंदगी की ये शाम आख़िरी है
    हुस्न वाले गले से लगा लें

    क़ब्र में लाश रखने से पहले
    कोई अच्छा सा आँचल उड़ा लें

    कल क़यामत सर-ए-शाम होगी
    कहना पहले से दीपक जला लें

    मैं तो ख़ार-ए-मुग़ीलाँ हूँ कोई
    गर बचाना हो दामन बचा लें

    ज़िंदगी चार दिन की बची है
    जो कमाना है जल्दी कमा लें
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    आजकल सब नाम से घबरा रहे
    सर न जाने कितनों के चकरा रहे

    जाना है जा जाने वाले जा रहे
    आना है आ आने वाले आ रहे

    ढंग के लत्ते पहन ले यार तू
    आज पक्की करने वाले आ रहे

    ले लगा अंदाज़ कितना इश्क़ है
    मेरी ग़लती हाथ वो फैला रहे

    फूल की शबनम कहीं क्या गिर गई
    रात से भँवरे सभी चिल्ला रहे
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    "वक़्त"
    ये वक़्त ही है जिसने
    किसू को दुख में हँसा दिया
    किसू को ख़ुशी में रुला दिया
    किसू को दिन में सुला दिया
    किसू को शब में उठा दिया
    ये वक़्त ही है जो
    कभू घर को उजाड़ दे
    कभू घर को सँवार दे
    कभू दे सब्ज़ जा-ब-जा
    कभू बहार छीन ले
    ये कौन है ये कौन है
    ये वक़्त है ये वक़्त है
    उसूल का सख़्त है
    जब इसने पासे पलट दिए
    फ़क़ीर सेठ हो गए
    चूहे शेर हो गए
    इसी से लाठियाँ चलीं
    इसी से हस्तियाँ मिटीं
    इसी से बाज़ियाँ कटीं
    इसी से बस्तियाँ जलीं
    इसी से गोलियाँ चलीं
    वक़्त की जंग में
    किसू ने हाथ खो दिया
    किसू ने कुछ गँवा दिया
    यह वक़्त ही है जिसने
    एक से एक धुरंधर को
    माटी में मिला दिया
    बुलंद जिसके हौसले
    क़दर जो वक़्त की जानता
    वक़्त उसी का हसीन है
    जिसका वक़्त हसीन है
    समझो वो नवाब है
    जो इससे अनजान है
    उसका वक़्त ख़राब है
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    Prashant Kumar
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    तुम्हारे बाद से दुनिया मुझे शमशान लगती है
    तुम्हारे बाद हर महफ़िल मुझे वीरान लगती है

    क़बा ऐसी तो पहनाकर तुझे पहचान लूँ जिसमें
    मुझे ऐसी क़बा में तू कोई शैतान लगती है

    मरुँ तो इक तिलक इसका जबीं पर भी लगा देना
    मुझे इस हिन्द की मिट्टी मिरा भगवान लगती है

    तुझे तो आस्ताँ पर दिल ने पहली बार देखा है
    कहाँ से आई है तू मौत का ऐलान लगती है
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