जिस को देना हो उस को दे दो आज़ादी
मुझ को अच्छी लगती है अपनी बर्बादी
मुझ को अच्छी लगती है अपनी बर्बादी
बेटा हाकिम है वकील बहू मैं भी मुंसिफ़
नाती मुज़रिम क्या क़िस्मत है बे-औलादी
तरबूज़ में चाक़ू मार या चाक़ू पे तरबूज़
तुझ को ही फटना है मैं तो हूँ फ़ौलादी
पिछली बार आए तो सब में वीराना था
अब दिन के दिन ही बढ़ती जाए आबादी
तुम कुछ भी करे कोई रोको मत करने दो
याँ सब की है अब अपनी अपनी आज़ादी
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जब तक है सुनो साँस तभी तक ये जहाँ है
फिर बा'द में क्या किस को ख़बर कौन कहाँ है
फिर बा'द में क्या किस को ख़बर कौन कहाँ है
जो शख़्स ज़माने में अगर झुक के रहा है
क़दमों में उसी के तो अरे सारा जहाँ है
कोई भी मोहब्बत का अभी ज़िक्र न करना
क्यूँ पास मिरे बैठा हुआ सारा जहाँ है
ले काम से पहले ही सभी ज़ाफ़ गए हैं
अब आज के इंसान में वो जान कहाँ है
मेहमान हैं दो दिन के सभी जाएँगे इक दिन
कुछ और नहीं भाई यही उम्र-ए-रवाँ है
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मौत तू ही गले लगा ले आ
इस ज़माने में कौन है अपना
इस ज़माने में कौन है अपना
फ़र्क है इल्म में तिरे मेरे
तू पढ़े है किताब मैं दुनिया
फ़र्क है तेरे मेरे नश्शे में
तू पिए जाम मैं ग़म-ए-दुनिया
फ़र्क है परवरिश में तेरी मिरी
तू रहा घर मैं साग़र-ओ-मीना
बे-वजह ही किसी पे दोष धरें
ज़िंदगी ने किया हमें रुस्वा
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नेक़ी के रास्ते कि बदी से सने लगे
जब से दलील-बाज़ लगाने गले लगे
जब से दलील-बाज़ लगाने गले लगे
ख़ाली क़लम को जेब पे कल क्या लगा दिया
अनपढ़ गँवार लोगों के सीने तने लगे
कोई ख़ता नहीं थी मिरी जान बूझकर
वो आए और झोपड़े को फूँकने लगे
बरसात तो कहीं भी नहीं दूर दूर तक
फिर क्यूँ तिरे दयार सभी सूखने लगे
घिन आ रही थी शायद उने हाल देख कर
कर के निगाह मेरी तरफ़ थूकने लगे
ऐसा नहीं कि शख़्स कोई जानता नहीं
सब जानते हैं फिर भी मुझे घूरने लगे
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गर बनाना है दूल्हा बना लें
वरना हम से वो दामन छुड़ा लें
जो हुआ सो हुआ उन से बोलो
मेरे कूचे से दूरी बना लें
बारिश-ए-संग का है ये मौसम
हुस्न कह दो ज़मीं में छुपा लें
छोड़ दे जब सर-ए-राह दुनिया
उन से कहना कि हम को बुला लें
ज़िंदगी की ये शाम आख़िरी है
हुस्न वाले गले से लगा लें
क़ब्र में लाश रखने से पहले
कोई अच्छा सा आँचल उड़ा लें
कल क़यामत सर-ए-शाम होगी
कहना पहले से दीपक जला लें
मैं तो ख़ार-ए-मुग़ीलाँ हूँ कोई
गर बचाना हो दामन बचा लें
ज़िंदगी चार दिन की बची है
जो कमाना है जल्दी कमा लें
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आजकल सब नाम से घबरा रहे
सर न जाने कितनों के चकरा रहे
सर न जाने कितनों के चकरा रहे
जाना है जा जाने वाले जा रहे
आना है आ आने वाले आ रहे
ढंग के लत्ते पहन ले यार तू
आज पक्की करने वाले आ रहे
ले लगा अंदाज़ कितना इश्क़ है
मेरी ग़लती हाथ वो फैला रहे
फूल की शबनम कहीं क्या गिर गई
रात से भँवरे सभी चिल्ला रहे
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"वक़्त"
ये वक़्त ही है जिस ने
ये वक़्त ही है जिस ने
किसू को दुख में हँसा दिया
किसू को ख़ुशी में रुला दिया
किसू को दिन में सुला दिया
किसू को शब में उठा दिया
ये वक़्त ही है जो
कभू घर को उजाड़ दे
कभू घर को सँवार दे
कभू दे सब्ज़ जा-ब-जा
कभू बहार छीन ले
ये कौन है ये कौन है
ये वक़्त है ये वक़्त है
उसूल का सख़्त है
जब इसने पासे पलट दिए
फ़क़ीर सेठ हो गए
चूहे शे'र हो गए
इसी से लाठियाँ चलीं
इसी से हस्तियाँ मिटीं
इसी से बाज़ियाँ कटीं
इसी से बस्तियाँ जलीं
इसी से गोलियाँ चलीं
वक़्त की जंग में
किसू ने हाथ खो दिया
किसू ने कुछ गँवा दिया
ये वक़्त ही है जिस ने
एक से एक धुरंधर को
माटी में मिला दिया
बुलंद जिस के हौसले
क़दर जो वक़्त की जानता
वक़्त उसी का हसीन है
जिस का वक़्त हसीन है
समझो वो नवाब है
जो इस से अनजान है
उस का वक़्त ख़राब है
Read Fullकिसू को ख़ुशी में रुला दिया
किसू को दिन में सुला दिया
किसू को शब में उठा दिया
ये वक़्त ही है जो
कभू घर को उजाड़ दे
कभू घर को सँवार दे
कभू दे सब्ज़ जा-ब-जा
कभू बहार छीन ले
ये कौन है ये कौन है
ये वक़्त है ये वक़्त है
उसूल का सख़्त है
जब इसने पासे पलट दिए
फ़क़ीर सेठ हो गए
चूहे शे'र हो गए
इसी से लाठियाँ चलीं
इसी से हस्तियाँ मिटीं
इसी से बाज़ियाँ कटीं
इसी से बस्तियाँ जलीं
इसी से गोलियाँ चलीं
वक़्त की जंग में
किसू ने हाथ खो दिया
किसू ने कुछ गँवा दिया
ये वक़्त ही है जिस ने
एक से एक धुरंधर को
माटी में मिला दिया
बुलंद जिस के हौसले
क़दर जो वक़्त की जानता
वक़्त उसी का हसीन है
जिस का वक़्त हसीन है
समझो वो नवाब है
जो इस से अनजान है
उस का वक़्त ख़राब है
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ख़ाक बस्तियों में घर रेत के बनाओगे
रोज़ रोज़ ऐसे ही ख़ूब चोट खाओगे
रोज़ रोज़ ऐसे ही ख़ूब चोट खाओगे
सोचते तो हैं हम भी छत से कूद जाएँ अब
फिर ख़याल आता है तुम कहाँ पे जाओगे
जो हमारे हो कर भी हर किसी को देखोगे
बे-वफ़ा की गिनती में यार आ ही जाओगे
बे-नक़ाब होकर के हम निकल तो आएँगे
हो गया कहीं कुछ भी हमपे टिन-टिनाओगे
शब के आठ बजते ही तुम कहाँ पे जाते हो
कोई पूछ बैठा फिर बोलो क्या बताओगे
जब रक़ीब बनकर ही कुछ नहीं हुआ तुम से
तुम हबीब बनकर क्या बस्तियाँ जलाओगे
जब नज़र झुकाओगे बात बन ही जाएगी
प्यार से जो बोलेंगे तुम भी मान जाओगे
इश्क़ का मुहब्बत का जब बुख़ार आएगा
वक़्त पर दवा लेना ख़ुद ही भूल जाओगे
जब कभी भी तन्हाई नोच कर के खाएगी
मेरा नाम लिख कर तुम हाथ पर मिटाओगे
दास्ताँ मोहब्बत की एक बार सुन लोगे
मेरा नाम गीतों में तुम भी गुन-गुनाओगे
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तुम्हारे बा'द से दुनिया मुझे शमशान लगती है
तुम्हारे बा'द हर महफ़िल मुझे वीरान लगती है
तुम्हारे बा'द हर महफ़िल मुझे वीरान लगती है
क़बा ऐसी तो पहनाकर तुझे पहचान लूँ जिस
में
मुझे ऐसी क़बा में तू कोई शैतान लगती है
मरुँ तो इक तिलक इस का जबीं पर भी लगा देना
मुझे इस हिन्द की मिट्टी मिरा भगवान लगती है
तुझे तो आस्ताँ पर दिल ने पहली बार देखा है
कहाँ से आई है तू मौत का ऐलान लगती है
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