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Sibgatullah Anwer
SHER
जिस के हाथों में ये ख़ंजर है अभी
वो मिरी जाँ का मुक़द्दर था कभी
Sibgatullah Anwer
10
SHER
महफ़िल में अपनी उस को बुलाता रहा हूँ मैं
फिर उस को अपने शे'र सुनाता रहा हूँ मैं
Sibgatullah Anwer
9
SHER
नक्बत तो ये है के वो हसीना मिरी नहीं
ख़ुद को मगर यक़ीन दिलाता रहा हूँ मैं
Sibgatullah Anwer
8
SHER
उस की बातों में खोया न कर हर दफ़ा
सिर्फ़ क़िस्से हैं कोई हक़ाइक नहीं
Sibgatullah Anwer
7
SHER
ख़ुद ही अपना ध्यान रखना है मुझे
इश्क़ में मैं भी क़लंदर था कभी
Sibgatullah Anwer
6
SHER
राह में चलते हुए जो खो गया
मेरी मंज़िल का वो रहबर था कभी
Sibgatullah Anwer
5
SHER
वक़्त की धारा ने बदला है उसे
ये जो दरिया है समुंदर था कभी
Sibgatullah Anwer
4
SHER
कैसी ये रग़बत कैसे हो क़रार जानाँ
कर ले हम पे थोड़ा तो ए'तिबार जानाँ
Sibgatullah Anwer
3
SHER
इतनी शदीद आरज़ू है तेरे लम्स की
तेरी महक से काम चलाता रहा हूँ मैं
Sibgatullah Anwer
2
SHER
वो मेरी है वो मेरी है फ़क़त मेरी
ये बात सारी दुनिया को बताती है
Sibgatullah Anwer
1
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