जब कभी मैं कहता ख़ुद को फ़ुजू़ल है लड़की
    डाँट कर माँ कहती सुन एक फूल है लड़की

    चूम कर वो आयत बोली लगाओ रामायण
    मैं भी जा के मंदिर बोला क़ुबूल है लड़की

    SIDDHARTH SHARMA
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    तेरा होना नहीं भरता जरा भी रौनकें मुझमें
    तेरा जाना भी मुझको यार अब तन्हा नहीं करता

    ये मेरी है मुहब्बत मैं अकेला कर भी सकता हूँ
    तेरा मौजूद होना इसको अब दूना नहीं करता

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    उसे क्या ही पता होगा इबादत किस को कहते है
    मुझे पूछा जो करती थी मोहब्बत किस को कहते है

    सभी वादें सभी क़समें सनम निकले महज़ क़िस्से
    तसव्वुर से मैं ने सीखा हक़ीक़त किस को कहते है

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    ख़ुदा ने है किया इस इश्क़ को मुश्किल
    वही मुश्किल को फिर आसाँ बनाता है

    मुहब्बत के सभी क़िस्से बुने उसने
    वही दो जिस्म को इक जाँ बनाता है

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    मोहब्बत ने सिखाया है
    मोहब्बत वक़्त ज़ाया है

    मगर ये दिल न जाने क्यों
    गुलाबें फिर ले आया है

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    आसमाँ के टूटते तारो से मत मांगो मुरादे
    हौसला दो तुम उसे वो झिलमिलाना हारा होगा

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    पुरानी फ़ोटो उसकी देखता हूँ मैं
    नई तस्वीर आँखों को रुलाती है

    वो मुझको छोड़ कर ऐसे गयी 'साहिर'
    माँ जैसे छोड़ कर बच्चे को जाती है

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    जीता बना दे या हारा बना दे
    ऐ माँ मुझे भी सितारा बना दे

    दरहम के आलम में न छोड़ मुझको
    अपनी नज़र का नज़ारा बना दे

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    दिल के अंदर दुकान होता है
    जिसका बाहर मकान होता है

    दिल के इक हिस्से में मोहब्बत बस
    बाक़ी सब में जहान होता है

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    तू मुझको देख तेरे शहर में घर है मोहब्बत का
    जो रोता है नहीं उसको मगर तू याद आती है

    तू मुझसे डर हाँ सच में डर मैं तेरा नाम ले दूँगा
    मोहब्बत है नहीं तो तू ग़ज़ल के बाद आती है

    SIDDHARTH SHARMA
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