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हो रही है ख़ुशी ये बताते हुए
वक़्त कितना हुआ अब छुपाते हुए
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रौशनी से वास्ता क्या मेरा
तीरगी ही है नसीबा मेरा
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तुझ को अपने लिए ज़रूरी लिक्खूँगा मैं
बिन तेरे ज़िंदगी अधूरी लिक्खूँगा मैं
बिन तेरे ज़िंदगी अधूरी लिक्खूँगा मैं
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जिस भी शब ख़्वाब में मैं ने देखा तुझे
सुब्ह ऑंखें खुली मुस्कुराते हुए
सुब्ह ऑंखें खुली मुस्कुराते हुए
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यूँ तुझे सामने अपने मैं बिठाया करता
तू मुझे देखती मैं तुझ को निहारा करता
तू मुझे देखती मैं तुझ को निहारा करता
देख कर मुझ को निगाहें तू चुराया करती
अपनी आँखों से तुझे मैं भी इशारा करता
तू मिरे शानों पे सर रख के यूँ सोया करती
मैं तिरे ख़ुशबू को साँसों में समाया करता
देर तक हम भी जो इक दूजे से करते बातें
मैं तुझे अपनी ग़ज़ल पहले सुनाया करता
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