सिग्नल के वो इक दो लम्हे बरसों हम को याद रहे
गजरे वाला बोला था जब साहब जोड़ी शाद रहे
गजरे वाला बोला था जब साहब जोड़ी शाद रहे
चौराहे पर याद है कैसे देता था मजज़ूब दुआ
तेरे घर का चूल्हा चोखा सदियों तक आबाद रहे
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वही पीछे खड़ा है मुक़्तदी बनकर
जो बहकाता रहा हर पल बदी बनकर
जो बहकाता रहा हर पल बदी बनकर
हमेशा ख़ुद को कहता हूँ ज़रा थम जा
करेगा क्या रवाँ होती नदी बनकर
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मुझे इस तरह से गिराया गया है
कि जैसे दिए को बुझाया गया है
कि जैसे दिए को बुझाया गया है
अकेले बचे हो फ़क़त इस वजह से
शजर से परिंदा उड़ाया गया है
रुका ही नहीं है कोई कुर्ब मेरे
रुका गर है कोई रुलाया गया है
उसे ढूंढता हूँ दिनों रात अब मैं
जिसे रात दिन बस सताया गया है
कभी आग जिस ने बुझायी थी मेरी
ख़ुदाया उसे ही जलाया गया है
बरोज़े क़यामत शफ़ाअत करेंगे
वही जिन को तन्हा सताया गया है
कहद आ रहे हैं कहीं ज़लज़ले भी
फ़क़ीरों को दर से उठाया गया है
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कुन कहा हस्ती बनाई बाँट दी
उस ख़ुदा ने सब ख़ुदाई बाँट दी
उस ख़ुदा ने सब ख़ुदाई बाँट दी
एक कासा माँग कर दरवेश से
मंगतों को पारसाई बाँट दी
ज़िन्दगी भर कुछ कमाया था नहीं
ज़िन्दगी भर की कमाई बाँट दी
निस्बते हैदर मिली जो मारिफत
सब फ़क़ीरों को विलाई बाँट दी
माफ़ कर के क़ातिले वालिद को यूँ
जंग में सारी भलाई बाँट दी
ज़िन्दगी सारी गुज़ारी क़ैद में
और अचानक सब शनाई बाँट दी
शे'र सारे हैं गवाही बात की
हालते दिल थी छुपाई बाँट दी
हाल जब ज़ाहिर किया यक़्सा ने तो
हर सुख़न-वर को रूबाई बाँट दी
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सब हमें मुयस्सर है बस यही सताता है
चाहिए हमें जो बस वो हमें नहीं मिलता
चाहिए हमें जो बस वो हमें नहीं मिलता
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