कुन कहा हस्ती बनाई बाँट दी

उस ख़ुदा ने सब ख़ुदाई बाँट दी

एक कासा माँग कर दरवेश से
मंगतों को पारसाई बाँट दी

ज़िन्दगी भर कुछ कमाया था नहीं
ज़िन्दगी भर की कमाई बाँट दी

निस्बते हैदर मिली जो मारिफत
सब फ़क़ीरों को विलाई बाँट दी

माफ़ कर के क़ातिले वालिद को यूँ
जंग में सारी भलाई बाँट दी

ज़िन्दगी सारी गुज़ारी क़ैद में
और अचानक सब शनाई बाँट दी

शे'र सारे हैं गवाही बात की
हालते दिल थी छुपाई बाँट दी

हाल जब ज़ाहिर किया यक़्सा ने तो
हर सुख़न-वर को रूबाई बाँट दी

— Talib akbarabadi

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