Paplu Lucknawi

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@paplu-lucknawi

Paplu Lucknawi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Paplu Lucknawi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
  • Ghazal
ये इश्क़-विश्क़ का क़िस्सा तमाम हो जाए
सफ़ेद दाढ़ी हवस की गुलाम हो जाए

जवान लड़कियों बूढ़ों से तुम रहो हुश्यार
न जाने कौन कहाँ आसाराम हो जाए
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Paplu Lucknawi
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जिस फ़िल्म का हीरो मुझे होना था ऐ पपलू
उस फिल्म के दो दिन से टिकट बेच रहा हूँ

हर काम पुलिस वालों की मर्ज़ी से करूँगा
दारू भी मैं थाने के निकट बेच रहा हूँ
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मैं क्या करूँ मेरी बेगम सुहाग ढूँढे़ है
मेरे बुझे हुए चूल्हे में आग ढूँढ़े है

वो दिन गए कि उड़ाते थे फ़ाख़्ताएँ हम
सपेरा चूहे के इक बिल में नाग ढूँढे़ है
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Paplu Lucknawi
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मेरी जवानी को कमज़ोर क्यों समझते हो
तुम्हारे वास्ते अब भी शबाब बाक़ी है

ये और बात है बोतल ये गिर के टूट गई
मगर अभी भी ज़रा सी शराब बाक़ी है
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Paplu Lucknawi
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पैसा कमाने आते हैं सब राजनीति में
आता नहीं है कोई भी खोने के वास्ते

छम्मो का मुजरा सुनते हैं नेता जो रात भर
संसद भवन में आते हैं सोने के वास्ते
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Paplu Lucknawi
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उतरी हुई नदी को समंदर कहेगा कौन
सत्तर अगर हैं आप बहत्तर कहेगा कौन

पपलू से उनकी बीवी ने कल रात कह दिया
मैं देखती हूँ आपको शौहर कहेगा कौन
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Paplu Lucknawi
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न तेरे आने से मेरा शबाब लौटा है
न दिल लगाने से मेरा शबाब लौटा है

क़सम ख़ुदा की बताता हूँ राज़ ये तुमको
नहारी खाने से मेरा शबाब लौटा है
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इक दिन के लिए घर को परी-ख़ाना बना दे
अल्लाह मुझे उनका ग़ुसल-ख़ाना बना दे

मोटी है बहुत बीवी तो हुश्यार रहा कर
वो मूड में आकर तेरा सुरमा ना बना दे
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मसाइल तो बहुत से हैं मगर बस एक ही हल है
सहर से शाम तक सर मेरा है बेगम की चप्पल है

मेरे मालिक भला इससे बुरी भी क्या सज़ा होगी
मेरा शादीशुदा होना ही दोज़ख़ की रिहर्सल है
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बच्चों तुम्हीं बताओ कि मईया कहाँ गई
रस्ते में छोड़कर ये सुरईया कहाँ गई

इन रक्षकों के ख़ौफ़ से घर में छुपा हूँ मैं
पूछेंगे ये ज़रूर कि गईया कहाँ गई
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Paplu Lucknawi
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मुझे भी अपनी क़िस्मत पर हमेशा नाज़ रहता है
सुना है ख़्वाहिशें उनकी भी शर्मिंदा नहीं रहती

सुना है वो भी अब तक खाए बैठी हैं कई शौहर
बहुत दिन तक मेरी भी बीवियाँ ज़िंदा नहीं रहती
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खद्दर पहन के बेच रहा था शराब वो
देखा मुझे तो हाथ में झंडा उठा लिया

मैं भी कोई गँवार सिपाही न था जनाब
मैंने भी जाम फेंक के डंडा उठा लिया
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मुत्तकी हो गया ख़ौफ़-ए-बीवी से मैं
अब इबादत का सौदा मेरे सर में है

मैंने दाढ़ी बढ़ाई तो कहने लगी
अब कमीना ये हूरों के चक्कर में है
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कोई भी रोक न पाता, गुज़र गया होता
मेरा नसीब-ए-मोहब्बत सँवर गया होता

न आईं होती जो बेग़म मेरी अयादत को
मैं अस्पताल की नर्सों पर मर गया होता
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