@hameed_sarwar
Hameed Sarwar Bahraichi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Hameed Sarwar Bahraichi's shayari and don't forget to save your favorite ones.
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हमारे ख़्वाब समुंदर में डूब जाते हैं
सो अपने ख़्वाब में हम कश्तियाँ बनाते हैं
हम मुनाफ़िक़ की किसी बात में आएँगे नहीं
चाहे तन्हा रहें जज़्बात में आएँगे नहीं
ज़र्फ़ वाले हैं मुहब्बत है हमारा पेशा
यानी कुछ भी हो ख़ुराफ़ात में आएँगे नहीं
मुख़लिस रहे सख़ी भी रहे मोतबर रहे
हर शख़्स की नज़र में मगर मुख़्तसर रहे
उसने बस एक बार में दीवाना कर दिया
हम लाख कोशिशों के इवज़ बेअसर रहे
कमाल ये नहीं उसको भुला चुका हूँ मैं
कमाल ये है बहुत दूर जा चुका हूँ मैं
वो छोड़ कर के गया जिस मुक़ाम पर मुझको
उसी मुक़ाम को मंज़िल बना चुका हूँ मैं
हज़ारों बार अपनी बेबसी पर रो चुके हैं हम
मगर फिर भी हमारी ज़िद है कश्ती पार करने की
कमाल ये नहीं उसको भुला चुका हूँ मैं
कमाल ये है बहुत दूर जा चुका हूँ मैं
इन आँखों को तुम्हारे हिज्र में बीमार करने की
रही हसरत न कोई अब तुम्हें यूँ प्यार करने की
ये सोच कर किसी मजनूँ ने हाथ काटे हैं
वो हाथ रख दे किसी ज़ख़्म पर तो शादाबी
एक किरदार सिमट आया फ़साने भर में
ज़ख़्म नासूर हुआ सबको दिखाने भर में
थी बड़ी बात बदलता जो हमारा मेयार
वरना ये साल ही बदलेगा ज़माने भर में
ज़िंदगी अब मज़ा नहीं देती
काश कोई तो हमसफ़र होता
चोट लगती तो हम संभल जाते
काश ऐसा भी कुछ हुनर होता
हुआ जो इश्क़ तो वो रोज़ ओ शब को भूल गए
वो अपने इश्क़ ए नुमाइश में सब को भूल गए
कहाँ वो दुनिया में आए थे बंदगी के लिए
मिला सुकून जहां में तो रब को भूल गए
अदब वाले अदब की महफ़िलें पहचान लेते हैं
उन्हें तुम प्यार से कुछ भी कहो वो मान लेते हैं
जहाँ तक देख सकते हैं वहाँ तक सुन नहीं सकते
मगर जब इश्क़ हो जाए तो धड़कन जान लेते हैं
ईमान की दौलत का असर सूख रहा है
क्या बात कि सर सब्ज़ शजर सूख रहा है
आराम नहीं ज़ीस्त को ज़िंदान में सरवर
हर लम्हा मेरा कस्ब-ए-हुनर सूख रहा है
ग़मों की धूप में बैठे हैं मुस्कुराते हैं
न जाने कौन सा दुख है जो हम छुपाते हैं
किसे ख़बर है यहाॅं कौन किसका अपना है
सभी के अपने मसाइल हैं आज़माते हैं
अँधेरी रात ये बतला रही है
उदासी हम सभी को खा रही है
मेरे ख़्वाबों में इक कच्ची डगर है
और उस पर रेलगाड़ी जा रही है
हुस्न की दस्तरस में थे हम भी कभी
हुस्न ढलता गया हम निकलते गए
मोम जैसे थे हम, आग जैसी थी वो
वो सुलगती गई हम पिघलते गए
जब भी वो सामने नज़र आए
मेरी आँखों में अश्क भर आए
दर-बदर ढूँढते रहे ख़ुद को
बाद मुद्दत के अपने घर आए
बिगड़ गई थी जो दुनिया सॅंवार दी हमने
चढ़ा के सर पे मुहब्बत उतार दी हमने