
ईमान की दौलत का असर सूख रहा है
क्या बात कि सर सब्ज़ शजर सूख रहा है
आराम नहीं ज़ीस्त को ज़िंदान में सरवर
हर लम्हा मेरा कस्ब-ए-हुनर सूख रहा है
— Hameed Sarwar Bahraichi
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