Akhtar Shirani

Akhtar Shirani

@akhtar-shirani

Akhtar Shirani shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Akhtar Shirani's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

25

Content

76

Likes

894

Shayari
Audios
  • Sher(24)
  • Ghazal(50)
  • Nazm(2)

Sher

काम आ सकीं न अपनी वफ़ाएँ तो क्या करें उस बे-वफ़ा को भूल न जाएँ तो क्या करें — Akhtar Shirani
मुझे है ए'तिबार-ए-वादा लेकिन तुम्हें ख़ुद ए'तिबार आए न आए — Akhtar Shirani
पलट सी गई है ज़माने की काया नया साल आया नया साल आया — Akhtar Shirani
मिट चले मेरी उमीदों की तरह हर्फ़ मगर आज तक तेरे ख़तों से तिरी ख़ुशबू न गई — Akhtar Shirani
अब जी में है कि उन को भुला कर ही देख लें वो बार बार याद जो आएँ तो क्या करें — Akhtar Shirani
याद आओ मुझे लिल्लाह न तुम याद करो मेरी और अपनी जवानी को न बर्बाद करो — Akhtar Shirani
थक गए हम करते करते इंतिज़ार इक क़यामत उन का आना हो गया — Akhtar Shirani
कुछ इस तरह से याद आते रहे हो कि अब भूल जाने को जी चाहता है — Akhtar Shirani
कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता तुम न होते न सही ज़िक्र तुम्हारा होता — Akhtar Shirani
आरज़ू वस्ल की रखती है परेशाँ क्या क्या क्या बताऊँ कि मेरे दिल में है अरमाँ क्या क्या — Akhtar Shirani
ज़िंदगी कितनी मसर्रत से गुज़रती या रब ऐश की तरह अगर ग़म भी गवारा होता — Akhtar Shirani
मुबारक मुबारक नया साल आया ख़ुशी का समाँ सारी दुनिया पे छाया — Akhtar Shirani
रात भर उन का तसव्वुर दिल को तड़पाता रहा एक नक़्शा सामने आता रहा जाता रहा — Akhtar Shirani
मुद्दतें हो गईं बिछड़े हुए तुम से लेकिन आज तक दिल से मिरे याद तुम्हारी न गई — Akhtar Shirani
अब तो मिलिए बस लड़ाई हो चुकी अब तो चलिए प्यार की बातें करें — Akhtar Shirani
माना कि सब के सामने मिलने से है हिजाब लेकिन वो ख़्वाब में भी न आएँ तो क्या करें — Akhtar Shirani
ख़फ़ा हैं फिर भी आ कर छेड़ जाते हैं तसव्वुर में हमारे हाल पर कुछ मेहरबानी अब भी होती है — Akhtar Shirani
उठते नहीं हैं अब तो दुआ के लिए भी हाथ किस दर्जा ना-उमीद हैं परवरदिगार से — Akhtar Shirani
दिन रात मय-कदे में गुज़रती थी ज़िंदगी 'अख़्तर' वो बे-ख़ुदी के ज़माने किधर गए — Akhtar Shirani
उन रस भरी आँखों में हया खेल रही है दो ज़हर के प्यालों में क़ज़ा खेल रही है — Akhtar Shirani

Ghazal

बहार आई है मस्ताना घटा कुछ और कहती है मगर उन शोख़ नज़रों की हया कुछ और कहती है रिहाई की ख़बर किस ने उड़ाई सेहन-ए-गुलशन में असीरान-ए-क़फ़स से तो सबा कुछ और कहती है बहुत ख़ुश है दिल-ए-नादाँ हवा-ए-कू-ए-जानाँ में मगर हम से ज़माने की हवा कुछ और कहती है तू मेरे दिल की सुन आग़ोश बन कर कह रहा है कुछ तिरी नीची नज़र तो जाने क्या कुछ और कहती है मिरी जानिब से कह देना सबा लाहौर वालों से कि इस मौसम में देहली की हवा कुछ और कहती है हुई मुद्दत के मय-नोशी से तौबा कर चुके 'अख़्तर' मगर देहली की मस्ताना फ़ज़ा कुछ और कहती है — Akhtar Shirani
ला पिला साक़ी शराब-ए-अर्ग़वानी फिर कहाँ ज़िंदगानी फिर कहाँ नादाँ जवानी फिर कहाँ दो घड़ी मिल बैठने को भी ग़नीमत जानिए उम्र फ़ानी ही सही ये उम्र-ए-फ़ानी फिर कहाँ आ कि हम भी इक तराना झूम कर गाते चलें इस चमन के ताएरों की हम-ज़बानी फिर कहाँ है ज़माना इश्क़-ए-सलमा में गँवा दे ज़िंदगी ये ज़माना फिर कहाँ ये ज़िंदगानी फिर कहाँ एक ही बस्ती में हैं आसाँ है मिलना आ मिलो क्या ख़बर ले जाए दौर-ए-आसमानी फिर कहाँ फ़स्ल-ए-गुल जाने को है दौर-ए-ख़िज़ाँ आने को है ये चमन ये बुलबुलें ये नग़्मा-ख़्वानी फिर कहाँ फूल चुन जी खोल कर ऐश-ओ-तरब के फूल चुन मौसम-ए-गुल फिर कहाँ फस्ल-ए-जवानी फिर कहाँ आख़िरी रात आ गई जी भर के मिल लें आज तो तुम से मिलने देगा दौर-ए-आसमानी फिर कहाँ आज आए हो तो सुनते जाओ ये ताज़ा ग़ज़ल वर्ना 'अख़्तर' फिर कहाँ ये शेर-ख़्वानी फिर कहाँ — Akhtar Shirani
याद आओ मुझे लिल्लाह न तुम याद करो अपनी और मेरी जवानी को न बर्बाद करो शर्म रोने भी न दे बेकली सोने भी न दे इस तरह तो मिरी रातों को न बर्बाद करो हद है पीने की कि ख़ुद पीर-ए-मुग़ाँ कहता है इस बुरी तरह जवानी को न बर्बाद करो याद आते हो बहुत दिल से भुलाने वालो तुम हमें याद करो तुम हमें क्यूँँ याद करो आसमाँ रुत्बा महल अपने बनाने वालो दिल का उजड़ा हुआ घर भी कोई आबाद करो हम कभी आएँ तिरे घर मगर आएँगे ज़रूर तुम ने ये वा'दा किया था कि नहीं याद करो चाँदनी रात में गुल-गश्त को जब जाते थे आह अज़रा कभी उस वक़्त को भी याद करो मैं भी शाइस्ता-ए-अल्ताफ़-ए-सितम हूँ शायद मेरे होते हुए क्यूँँ ग़ैर पे बेदाद करो सदक़े उस शोख़ के 'अख़्तर' ये लिखा है जिस ने इश्क़ में अपनी जवानी को न बर्बाद करो — Akhtar Shirani
उम्र-भर की तल्ख़ बेदारी का सामाँ हो गईं हाए वो रातें कि जो ख़्वाब-ए-परेशाँ हो गईं मैं फ़िदा उस चाँद से चेहरे पे जिस के नूर से मेरे ख़्वाबों की फ़ज़ाएँ यूसुफ़िस्ताँ हो गईं उम्र-भर कम-बख़्त को फिर नींद आ सकती नहीं जिस की आँखों पर तिरी ज़ुल्फ़ें परेशाँ हो गईं दिल के पर्दों में थीं जो जो हसरतें पर्दा-नशीं आज वो आँखों में आँसू बन के उर्यां हो गईं कुछ तुझे भी है ख़बर ओ सोने वाले नाज़ से मेरी रातें लुट गईं नींदें परेशाँ हो गईं हाए वो मायूसियों में मेरी उम्मीदों का रंग जो सितारों की तरह उठ उठ के पिन्हाँ हो गईं बस करो ओ मेरी रोने वाली आँखों बस करो अब तो अपने ज़ुल्म पर वो भी पशेमाँ हो गईं आह वो दिन जो न आए फिर गुज़र जाने के बा'द हाए वो रातें कि जो ख़्वाब-ए-परेशाँ हो गईं गुलशन-ए-दिल में कहाँ 'अख़्तर' वो रंग-ए-नौ-बहार आरज़ूएँ चंद कलियाँ थीं परेशाँ हो गईं — Akhtar Shirani
बुझा सा रहता है दिल जब से हैं वतन से जुदा वो सेहन-ए-बाग़ नहीं सैर-ए-माहताब नहीं बसे हुए हैं निगाहों में वो हसीं कूचे हर एक ज़र्रा जहाँ कम ज़े-आफ़्ताब नहीं वो बाग़-ओ-राग़ के दिलचस्प-ओ-दिल-नशीं मंज़र कि जिन के होते हुए ख़ुल्द मिस्ल-ए-ख़्वाब नहीं वो जूएबार-ए-रवाँ का तरब-फ़ज़ा पानी शराब से नहीं कुछ कम अगर शराब नहीं ब-रंग-ए-ज़ुल्फ़ परेशाँ वो मौज-हा-ए-रवाँ कि जिन की याद में रातों को फ़िक्र-ए-ख़्वाब नहीं समा रहे हैं नज़र में वो महव-शान-ए-हरम हरम में जिन के सितारे भी बारयाब नहीं वतन का छेड़ दिया किस ने तज़्किरा 'अख़्तर' कि चश्म-ए-शौक़ को फिर आरज़ू-ए-ख़्वाब नहीं — Akhtar Shirani
सू-ए-कलकत्ता जो हम ब-दिल-ए-दीवाना चले गुनगुनाते हुए इक शोख़ का अफ़्साना चले शहर-ए-सलमा है सर-ए-राह घटाएँ हमराह साक़िया आज तो दौर-ए-मय-ओ-पैमाना चले इस तरह रेल के हमराह रवाँ है बादल साथ जैसे कोई उड़ता हुआ मय-ख़ाना चले शहर-ए-जानाँ में उतरने की थी हम पर क़दग़न यूँँ चले जैसे कोई शहर से बेगाना चले गरचे तन्हा थे मगर उन के तसव्वुर के निसार अपने हम-राह लिए एक परी-ख़ाना चले खेल उम्मीद के देखो कि न की उन को ख़बर फिर भी हम मुंतज़िर-ए-जल्वा-ए-जानाना चले उन का पैग़ाम न लाए हों ये रंगीं बादल वर्ना क्यूँँ साथ मिरे बे-ख़ुद ओ मस्ताना चले घर से ब-इशरत-ए-शाहाना हम आए थे मगर उन के कूचे से चले जब तो फ़क़ीराना चले बादलो ख़िदमत-ए-सलमा में ये कह दो जा कर कि तिरे शहर में हम आ के ग़रीबाना चले हसरत ओ शौक़ के आलम में चले यूँँ 'अख़्तर' मुस्कुराता हुआ जैसे कोई दीवाना चले — Akhtar Shirani
मिरी आँखों से ज़ाहिर ख़ूँ-फ़िशानी अब भी होती है निगाहों से बयाँ दिल की कहानी अब भी होती है सुरूर-आरा शराब-ए-अर्ग़वानी अब भी होती है मिरे क़दमों में दुनिया की जवानी अब भी होती है कोई झोंका तो लाती ऐ नसीम अतराफ़-ए-कनआँ तक सवाद-ए-मिस्र में अम्बर-फ़िशानी अब भी होती है वो शब को मुश्क-बू पर्दों में छुप कर आ ही जाते हैं मिरे ख़्वाबों पर उन की मेहरबानी अब भी होती है कहीं से हाथ आ जाए तो हम को भी कोई ला दे सुना है इस जहाँ में शादमानी अब भी होती है हिलाल ओ बद्र के नक़्शे सबक़ देते हैं इंसाँ को कि नाकामी बिना-ए-कामरानी अब भी होती है कहीं अग़्यार के ख़्वाबों में छुप छुप कर न जाते हों वो पहलू में हैं लेकिन बद-गुमानी अब भी होती है समझता है शिकस्त-ए-तौबा अश्क-ए-तौबा को ज़ाहिद मिरी आँखों की रंगत अर्ग़वानी अब भी होती है वो बरसातें वो बातें वो मुलाक़ातें कहाँ हमदम वतन की रात होने को सुहानी अब भी होती है ख़फ़ा हैं फिर भी आ कर छेड़ जाते हैं तसव्वुर में हमारे हाल पर कुछ मेहरबानी अब भी होती है ज़बाँ ही में न हो तासीर तो मैं क्या करूँँ नासेह तिरी बातों से पैदा सरगिरानी अब भी होती है तुम्हारे गेसुओं की छाँव में इक रात गुज़री थी सितारों की ज़बाँ पर ये कहानी अब भी होती है पस-ए-तौबा भी पी लेते हैं जाम-ए-ग़ुंचा-ओ-गुल से बहारों में जुनूँ की मेहमानी अब भी होती है कोई ख़ुश हो मिरी मायूसियाँ फ़रियाद करती हैं इलाही क्या जहाँ में शादमानी अब भी होती है बुतों को कर दिया था जिस ने मजबूर-ए-सुख़न 'अख़्तर' लबों पर वो नवा-ए-आसमानी अब भी होती है — Akhtar Shirani
ग़म-ख़ाना-ए-हस्ती में है मेहमाँ कोई दिन और कर ले हमें तक़दीर परेशाँ कोई दिन और मर जाएँगे जब हम तो बहुत याद करेगी जी भर के सता ले शब-ए-हिज्राँ कोई दिन और तुर्बत वो जगह है कि जहाँ ग़म है न हैरत हैरत-कदा-ए-ग़म में हैं हैराँ कोई दिन और यारों से गिला है न अज़ीज़ों से शिकायत तक़दीर में है हसरत-ओ-हिर्मां कोई दिन और पामाल-ए-ख़िज़ाँ होने को हैं मस्त बहारें है सैर-ए-गुल-ओ-हुस्न-ए-गुलिस्ताँ कोई दिन और हम सा न मिलेगा कोई ग़म-दोस्त जहाँ में तड़पा ले ग़म-ए-गर्दिश-ए-दौराँ कोई दिन और क़ब्रों की जो रातें हैं वो क़ब्रों में कटेंगी आबाद हैं ये ज़िंदा शबिस्ताँ कोई दिन और रंगीनी-ओ-नुज़हत पे न मग़रूर हो बुलबुल है रंग बहार-ए-चमनिस्ताँ कोई दिन और आख़िर को वही हम वही ज़ुल्मात-ए-शब-ए-ग़म है नूर-ए-रुख़-ए-माह-ए-दरख़्शाँ कोई दिन और आज़ाद हों आलम से तो आज़ाद हूँ ग़म से दुनिया है हमारे लिए ज़िंदाँ कोई दिन और हस्ती कभी क़ुदरत का इक एहसान थी हम पर अब हम पे है क़ुदरत का ये एहसाँ कोई दिन और ला'नत थी गुनाहों की नदामत मिरे हक़ में है शुक्र कि उस से हैं पशेमाँ कोई दिन और शेवन को कोई ख़ुल्द-ए-बरीं में ये ख़बर दे दुनिया में अब 'अख़्तर' भी है मेहमाँ कोई दिन और — Akhtar Shirani
यक़ीन-ए-वादा नहीं ताब-ए-इंतिज़ार नहीं किसी तरह भी दिल-ए-ज़ार को क़रार नहीं शबों को ख़्वाब नहीं ख़्वाब को क़रार नहीं कि ज़ेब-ए-दोश वो गेसू-ए-मुश्क-बार नहीं कली कली में समाई है निकहत-ए-सलमा शमीम-ए-हूर है ये बू-ए-नौ-बहार नहीं कहाँ कहाँ न हुए माह-रू जुदा मुझ से कहाँ कहाँ मिरी उम्मीद का मज़ार नहीं ग़मों की फ़स्ल हमेशा रही तर ओ ताज़ा ये वो ख़िज़ाँ है कि शर्मिंदा-ए-बहार नहीं बहार आई है ऐसे में तुम भी आ जाओ कि ज़िंदगी का ब-रंग-ए-गुल ए'तिबार नहीं किसी की ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ का साया-ए-रक़्साँ है फ़ज़ा में बाल-फ़िशाँ अब्र-ए-नौ-बहार नहीं सितारा-वार वो पहलू में आ गए शब को सहरस कह दो कि महफ़िल में आज बार नहीं गुल-ए-फ़सुर्दा भी इक तुर्फ़ा हुस्न रखता है ख़िज़ाँ ये है तो मुझे हसरत-ए-बहार नहीं हर एक जाम पे ये नग़्मा-ए-हज़ीं साक़ी कि इस जवानी-ए-फ़ानी का ए'तिबार नहीं ख़ुदा ने बख़्श दिए मेरे दिल को ग़म इतने कि अब मैं अपने गुनाहों पे शर्मसार नहीं चमन की चाँदनी रातें हैं किस क़दर वीराँ कि इस बहार में वो माह-ए-नौ-बहार नहीं शरीक-ए-सोज़ हैं परवाने शम्अ' के 'अख़्तर' हमारे दिल का मगर कोई ग़म-गुसार नहीं — Akhtar Shirani
हमारे हाथ में कब साग़र-ए-शराब नहीं हमारे क़दमों पे किस रोज़ माहताब नहीं जहाँ में अब कोई सूरत पए-सवाब नहीं वो मय-कदे नहीं साक़ी नहीं शराब नहीं शब-ए-बहार में ज़ुल्फ़ों से खेलने वाले तिरे बग़ैर मुझे आरज़ू-ए-ख़्वाब नहीं चमन में बुलबुलें और अंजुमन में परवाने जहाँ में कौन ग़म-ए-इश्क़ से ख़राब नहीं ग़म, आह इश्क़ के ग़म का कोई नहीं मौसम बहार हो कि ख़िज़ाँ कब ये इज़्तिराब नहीं उमीद-ए-पुर्सिश-ए-अहवाल हो तो क्यूँँकर हो सलाम का भी तिरी बज़्म में जवाब नहीं वतन का छेड़ दिया किस ने तज़्किरा 'अख़्तर' कि चश्म-ए-शौक़ को फिर आरज़ू-ए-ख़्वाब नहीं — Akhtar Shirani
दिल-ए-दीवाना-ओ-अंदाज़ बेबाकाना रखते हैं गदा-ए-मय-कदा हैं वज़्अ' आज़ादाना रखते हैं मुझे मय-ख़ाना थर्राता हुआ महसूस होता है वो मेरे सामने शर्मा के जब पैमाना रखते हैं घटाएँ भी तो बहकी जा रही हैं इन अदाओं पर चमन में जो क़दम रखते हैं वो मस्ताना रखते हैं ब-ज़ाहिर हम हैं बुलबुल की तरह मशहूर हरजाई मगर दिल में गुदाज़-ए-फ़ितरत-ए-परवाना रखते हैं जवानी भी तो इक मौज-ए-शराब-ए-तुंद-ओ-रंगीं है बुरा क्या है अगर हम मशरब-ए-रिंदाना रखते हैं किसी मग़रूर के आगे हमारा सर नहीं झुकता फ़क़ीरी में भी 'अख़्तर' ग़ैरत-ए-शाहाना रखते हैं — Akhtar Shirani
दिल-ए-शिकस्ता हरीफ़-ए-शबाब हो न सका ये जाम-ए-ज़र्फ़ नवाज़-ए-शराब हो न सका कुछ ऐसे रहम के क़ाबिल थे इब्तिदा ही से हम कि उन से भी सितम-ए-बे-हिसाब हो न सका नज़र न आया कभी शब को उन का जल्वा-ए-रुख़ ये आफ़्ताब कभी माहताब हो न सका निगाह-ए-फ़ैज़ से महरूम बरतरी मा'लूम सितारा चमका मगर आफ़्ताब हो न सका है जाम ख़ाली तो फीकी है चाँदनी कैसी ये सैल-ए-नूर सितम है शराब हो न सका ये मय छलक के भी उस हुस्न को पहुँच न सकी ये फूल घुल के भी उस का शबाब हो न सका किसी की शोख़-नवाई का होश था किस को मैं ना-तवाँ तो हरीफ़‌‌‌‌-ए-ख़िताब हो न सका हूँ तेरे वस्ल से मायूस इस क़दर गोया कभी जहाँ में कोई कामयाब हो न सका वो पूछते हैं तिरे दिल की आरज़ू क्या है ये ख़्वाब हाए कभी मेरा ख़्वाब हो न सका तलाश-ए-मा'नी-ए-हस्ती में फ़ल्सफ़ा न ख़िरद ये राज़ आज तलक बे-हिजाब हो न सका शराब-ए-इश्क़ में ऐसी कशिश सी थी 'अख़्तर' कि लाख ज़ब्त किया इज्तिनाब हो न सका — Akhtar Shirani
दिल-ए-महजूर को तस्कीन का सामाँ न मिला शहर-ए-जानाँ में हमें मस्कन-ए-जानाँ न मिला कूचा-गर्दी में कटीं शौक़ की कितनी रातें फिर भी उस शम-ए-तमन्ना का शबिस्ताँ न मिला पूछते मंज़िल-ए-सलमा की ख़बर हम जिस से वादी-ए-नज्द में ऐसा कोई इंसाँ न मिला यूँँ तो हर राह-गुज़र पर थे सितारे रक़्साँ जिस की हसरत थी मगर वो मह-ए-ताबाँ न मिला लाला-ओ-गुल थे बहुत आम चमन में लेकिन ढूँडते थे जिसे वो सर्व-ए-ख़िरामाँ न मिला जिस के पर्दों से मचलती हो वही निकहत-ए-शौक़ बे-ख़ुदी की क़सम ऐसा कोई ऐवाँ न मिला बख़्त-ए-बे-दार कहाँ जल्वा-ए-दिल-दार कहाँ ख़्वाब में भी हमें वो गुंचा-ए-ख़ंदाँ न मिला बेकसी तिश्ना-लबी दर्द-ए-हलावत-तलबी चाँदनी-रात में भी चश्मा-ए-हैवाँ न मिला यूँँ तो हर दर पे ही कहते नज़र आए दामन खींचते नाज़ से जिस को वही दामाँ न मिला किस के दर पर न किए सज्दे निगाहों ने मगर हाए तक़दीर वो ग़ारत-गर-ए-ईमाँ न मिला कौन से बाम को रह रह के न देखा लेकिन निगह-ए-शौक़ को वो माह-ए-ख़िरामाँ न मिला दर-ए-जानाँ पे फ़िदा करते दिल-ओ-जाँ 'अख़्तर' वाए बर-हाल-ए-दिल-ओ-जाँ दर-ए-जानाँ न मिला — Akhtar Shirani

Nazm

"ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर" ऐ इश्क़ न छेड़ आ आ के हमें हम भूले हुओं को याद न कर पहले ही बहुत नाशाद हैं हम तू और हमें नाशाद न कर क़िस्मत का सितम ही कम नहीं कुछ ये ताज़ा सितम ईजाद न कर यूँँ ज़ुल्म न कर बे-दाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर जिस दिन से मिले हैं दोनों का सब चैन गया आराम गया चेहरों से बहार-ए-सुब्ह गई आँखों से फ़रोग़-ए-शाम गया हाथों से ख़ुशी का जाम छुटा होंटों से हँसी का नाम गया ग़मगीं न बना नाशाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर हम रातों को उठ कर रोते हैं रो रो के दुआएँ करते हैं आँखों में तसव्वुर दिल में ख़लिश सर धुनते हैं आहें भरते हैं ऐ इश्क़ ये कैसा रोग लगा जीते हैं न ज़ालिम मरते हैं ये ज़ुल्म तू ऐ जल्लाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर ये रोग लगा है जब से हमें रंजीदा हूँ मैं बीमार है वो हर वक़्त तपिश हर वक़्त ख़लिश बे-ख़्वाब हूँ मैं बेदार है वो जीने पे इधर बेज़ार हूँ मैं मरने पे उधर तयार है वो और ज़ब्त कहे फ़रियाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर जिस दिन से बँधा है ध्यान तिरा घबराए हुए से रहते हैं हर वक़्त तसव्वुर कर कर के शरमाए हुए से रहते हैं कुम्हलाए हुए फूलों की तरह कुम्हलाए हुए से रहते हैं पामाल न कर बर्बाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर बे-दर्द! ज़रा इंसाफ़ तो कर इस उम्र में और मग़्मूम है वो फूलों की तरह नाज़ुक है अभी तारों की तरह मासूम है वो ये हुस्न सितम! ये रंज ग़ज़ब! मजबूर हूँ मैं मज़लूम है वो मज़लूम पे यूँँ बे-दाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर ऐ इश्क़ ख़ुदारा देख कहीं वो शोख़-ए-हज़ीं बद-नाम न हो वो माह-लक़ा बद-नाम न हो वो ज़ोहरा-जबीं बद-नाम न हो नामूस का उस के पास रहे वो पर्दा-नशीं बद-नाम न हो उस पर्दा-नशीं को याद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर उम्मीद की झूटी जन्नत के रह रह के न दिखला ख़्वाब हमें आइंदा की फ़र्ज़ी इशरत के वादों से न कर बेताब हमें कहता है ज़माना जिस को ख़ुशी आती है नज़र कमयाब हमें छोड़ ऐसी ख़ुशी को याद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर क्या समझे थे और तू क्या निकला ये सोच के ही हैरान हैं हम है पहले-पहल का तजरबा और कम-उम्र हैं हम अंजान हैं हम ऐ इश्क़! ख़ुदारा! रहम-ओ-करम मासूम हैं हम नादान हैं हम नादान हैं हम नाशाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर वो राज़ है ये ग़म आह जिसे पा जाए कोई तो ख़ैर नहीं आँखों से जब आँसू बहते हैं आ जाए कोई तो ख़ैर नहीं ज़ालिम है ये दुनिया दिल को यहाँ भा जाए कोई तो ख़ैर नहीं है ज़ुल्म मगर फ़रियाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर दो दिन ही में अहद-ए-तिफ़्ली के मासूम ज़माने भूल गए आँखों से वो ख़ुशियाँ मिट सी गईं लब को वो तराने भूल गए उन पाक बहिश्ती ख़्वाबों के दिलचस्प फ़साने भूल गए इन ख़्वाबों सी यूँँ आज़ाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर उस जान-ए-हया का बस नहीं कुछ बे-बस है पराए बस में है बे-दर्द दिलों को क्या है ख़बर जो प्यार यहाँ आपस में है है बेबसी ज़हर और प्यार है रस ये ज़हर छुपा इस रस में है कहती है हया फ़रियाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर आँखों को ये क्या आज़ार हुआ हर जज़्ब-ए-निहाँ पर रो देना आहंग-ए-तरब पर झुक जाना आवाज़-ए-फ़ुग़ाँ पर रो देना बरबत की सदा पर रो देना मुतरिब के बयाँ पर रो देना एहसास को ग़म बुनियाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर हर दम अबदी राहत का समाँ दिखला के हमें दिल-गीर न कर लिल्लाह हबाब-ए-आब-ए-रवाँ पर नक़्श-ए-बक़ा तहरीर न कर मायूसी के रमते बादल पर उम्मीद के घर तामीर न कर तामीर न कर आबाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर जी चाहता है इक दूसरे को यूँँ आठ पहर हम याद करें आँखों में बसाएँ ख़्वाबों को और दिल में ख़याल आबाद करें ख़ल्वत में भी हो जल्वत का समाँ वहदत को दुई से शाद करें ये आरज़ुएँ ईजाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर दुनिया का तमाशा देख लिया ग़मगीन सी है बेताब सी है उम्मीद यहाँ इक वहम सी है तस्कीन यहाँ इक ख़्वाब सी है दुनिया में ख़ुशी का नाम नहीं दुनिया में ख़ुशी नायाब सी है दुनिया में ख़ुशी को याद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर — Akhtar Shirani
"आँसू" मेरे पहलू में जो बह निकले तुम्हारे आँसू बन गए शाम-ए-मोहब्बत के सितारे आँसू देख सकता है भला कौन ये पारे आँसू मेरी आँखों में न आ जाएँ तुम्हारे आँसू शम्अ' का अक्स झलकता है जो हर आँसू में बन गए भीगी हुई रात के तारे आँसू मेंह की बूँदों की तरह हो गए सस्ते क्यूँँ आज मोतियों से कहीं महँगे थे तुम्हारे आँसू साफ़ इक़रार-ए-मोहब्बत हो ज़बाँ से क्यूँँकर आँख में आ गए यूँँ शर्म के मारे आँसू हिज्र अभी दूर है मैं पास हूँ ऐ जान-ए-वफ़ा क्यूँँ हुए जाते हैं बेचैन तुम्हारे आँसू सुब्ह-दम देख न ले कोई ये भीगा आँचल मेरी चुग़ली कहीं खा दें न तुम्हारे आँसू अपने दामान ओ गरेबाँ को मैं क्यूँँ पेश करूँँ हैं मिरे इश्क़ का इन'आम तुम्हारे आँसू दम-ए-रुख़्सत है क़रीब ऐ ग़म-ए-फ़ुर्क़त ख़ुश हो करने वाले हैं जुदाई के इशारे आँसू सदक़े उस जान-ए-मोहब्बत के मैं 'अख़्तर' जिस के रात भर बहते रहे शौक़ के मारे आँसू — Akhtar Shirani