yaad aao mujhe lillaah na tum yaad karo | याद आओ मुझे लिल्लाह न तुम याद करो

  - Akhtar Shirani

याद आओ मुझे लिल्लाह न तुम याद करो
मेरी और अपनी जवानी को न बर्बाद करो

  - Akhtar Shirani

Broken Shayari

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    shaan manral

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    पलट सी गई है ज़माने की काया
    नया साल आया नया साल आया
    Akhtar Shirani
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    उन रस भरी आँखों में हया खेल रही है
    दो ज़हर के प्यालों पे क़ज़ा खेल रही है

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    गुलशन में कोई शोख़ अदा खेल रही है

    उस बज़्म में जाएँ तो ये कहती हैं अदाएँ
    क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है

    उस चश्म-ए-सियह मस्त पे गेसू हैं परेशाँ
    मयख़ाने पे घनघोर घटा खेल रही है

    बद-मस्ती में तुम ने उन्हें क्या कह दिया 'अख़्तर'
    क्यूँ शोख़-निगाहों में हया खेल रही है
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    Akhtar Shirani
    तमन्नाओं को ज़िंदा आरज़ूओं को जवाँ कर लूँ
    ये शर्मीली नज़र कह दे तो कुछ गुस्ताख़ियाँ कर लूँ

    बहार आई है बुलबुल दर्द-ए-दिल कहती है फूलों से
    कहो तो मैं भी अपना दर्द-ए-दिल तुम से बयाँ कर लूँ

    हज़ारों शोख़ अरमाँ ले रहे हैं चुटकियाँ दिल में
    हया उन की इजाज़त दे तो कुछ बेबाकियाँ कर लूँ

    कोई सूरत तो हो दुनिया-ए-फ़ानी में बहलने की
    ठहर जा ऐ जवानी मातम-ए-उम्र-ए-रवाँ कर लूँ

    चमन में हैं बहम परवाना ओ शम्अ ओ गुल ओ बुलबुल
    इजाज़त हो तो मैं भी हाल-ए-दिल अपना बयाँ कर लूँ

    किसे मालूम कब किस वक़्त किस पर गिर पड़े बिजली
    अभी से मैं चमन में चल कर आबाद आशियाँ कर लूँ

    बर आएँ हसरतें क्या क्या अगर मौत इतनी फ़ुर्सत दे
    कि इक बार और ज़िंदा शेवा-ए-इश्क़-ए-जवाँ कर लूँ

    मुझे दोनों जहाँ में एक वो मिल जाएँ गर 'अख़्तर'
    तो अपनी हसरतों को बे-नियाज़-ए-दो-जहाँ कर लूँ
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    Akhtar Shirani
    ग़म-ए-ज़माना नहीं इक अज़ाब है साक़ी
    शराब ला मिरी हालत ख़राब है साक़ी

    शबाब के लिए तौबा अज़ाब है साक़ी
    शराब ला मुझे पास-ए-शबाब है साक़ी

    उठा पियाला कि गुलशन पे फिर बरसने लगी
    वो मय कि जिस का क़दह माहताब है साक़ी

    निकाल पर्दा-ए-मीना से दुख़्तर-ए-रज़ को
    घटा में किस लिए ये माहताब है साक़ी

    तू वाइ'ज़ों की न सुन मय-कशों की ख़िदमत कर
    गुनह सवाब की ख़ातिर सवाब है साक़ी

    ज़माने-भर के ग़मों को है दावत-ए-ग़र्रा
    कि एक जाम में सब का जवाब है साक़ी

    कलाम जिस का है मेराज 'हाफ़िज़'-ओ-'ख़य्याम'
    यही वो 'अख़्तर'-ए-ख़ाना-ख़राब है साक़ी
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    Akhtar Shirani
    हर एक जल्वा-ए-रंगीं मिरी निगाह में है
    ग़म-ए-फ़िराक़ की दुनिया दिल-ए-तबाह में है

    किसी की याद करम उफ़ अरे मआज़-अल्लाह
    तबाह हो के भी ज़ालिम दिल-ए-तबाह में है

    हज़ार पर्दों में ओ छुपने वाले ये सुन ले
    तिरा जमाल मिरे दामन-ए-निगाह में है

    जहाँ में मुझ से भी नाकाम-ए-आरज़ू कम हैं
    न रंग आह में है और न सोज़ आह में है
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    Akhtar Shirani

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