जब बुलंदी का गुमाँ था तो नहीं याद आईअपनी परवाज़ से टूटे तो ज़मीं याद आईवही आँखें कि जो ईमान-शिकन आँखें हैंउन्हीं आँखों की हमें दावत-ए-दीं याद आई— Subhan Asad