Harsh saxena

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@harsh_badshah_saxena

Harsh saxena shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Harsh saxena's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

हथेली पर तू मेरा नाम लिख ले मुझे मेहंदी की रंगत देखनी है — Harsh saxena
तेरी मेहंदी की रंगत मुझ को ये खुल कर बताती है कि हाथों पर तेरे लिक्खा हुआ प्यारा लगूँगा मैं — Harsh saxena
पाना या खोना तो उसे क़िस्मत की बात थी हम को तो दिल लगाने का हक़ भी न मिल सका — Harsh saxena
उस के लबों को चूम के ये इल्म हो गया मुझ को वो ज़हर के बिना भी मार सकती है — Harsh saxena
मयख़ाने की क़द्र है मेरी नज़रों में इसने जाने कितनी मौतें टाली हैं — Harsh saxena
अपने बदन की तुम भी हिफ़ाज़त न कर सके हम ने भी ख़ूब ग़ैर के चूल्हे से आग ली — Harsh saxena
हम ने क़ुबूल कर लिया अपना हर एक जुर्म अब आप भी तो अपनी अना छोड़ दीजिए — Harsh saxena
उम्र से मेरी फ़नकारी को मत आँको उस्तादों से बेहतर ग़ज़लें कहता हूँ — Harsh saxena
चाहे तो कोशिश कर लो दावा है भूल न पाओगी जब भी ज़िक्र-ए-वफ़ा होगा तुम मेरे शे'र सुनाओगी — Harsh saxena
इसी ख़्वाब में ज़ाया' किया 'ईद को हर दम कभी बोले वो सीने से लग कर मुबारक हो — Harsh saxena
बदन उतार के खूँटी पे टाँग आया हूँ तुम्हारा फ़र्ज़ है मुझ को गले लगाने का — Harsh saxena
यक़ीनन उस ने फिर दुनिया में कुछ प्यारा नहीं देखा तुम्हारे कान का जिस ने अभी झुमका नहीं देखा — Harsh saxena
कोई तो पूछे मोहब्बत के इन फ़रिश्तों से वफ़ा का शौक़ ये बिस्तर पे क्यूँ उतर आया — Harsh saxena
फ़रेब दे गया इस सादगी से वो मुझ को कि जुर्म सारा ही मजबूरियों के सर आया — Harsh saxena
भले ही सैकड़ों मजबूरियाँ हों बेवफ़ाई की मगर तुम वज्ह मत बनना किसी सूनी कलाई की — Harsh saxena
पड़ गया महँगा तेरी फोटो हटाना पर्स का हर नोट जाली हो गया है — Harsh saxena
दिल तुम्हारा भी किसी से लगे तो तुम जानो किस तरह हँसते हुए ज़हर पिया जाता है — Harsh saxena
कुछ इस सलीक़े से माथे पे उस ने होंट रखे बदन को छोड़ के सारी थकन को चूम लिया — Harsh saxena
हम क्या जानें जन्नत कैसी होती है उस सेे पूछो जिस ने तुम को पाया है — Harsh saxena

Ghazal

क़िस्मत का लिक्खा भी कब मिट पाया है हम ने भी रो रो कर काम चलाया है हम क्या जानें जन्नत कैसी होती है उस सेे पूछो जिस ने तुम को पाया है हम सेे पूछो प्यार की पिच के पेच-ओ-ख़म हम ने सब सेे पहले गच्चा खाया है जिस की ख़ातिर सब इल्ज़ाम लिए सर पे उस ने भी हम पर इल्ज़ाम लगाया है इक तितली के उड़ जाने के मातम में जाने सारा गुलशन क्यूँ मुरझाया है यूँँ तो शहर-ए-दिल में भीड़ बहुत है पर उस की अब तक कौन जगह ले पाया है हिज्र की दीमक ने तन का ये हाल किया मुझ पे बुढ़ापा उम्र से पहले आया है अच्छे शे'र की क़ीमत हम ही जाने हैं हम ने उस को पाकर यार गँवाया है उस के शहर से आने वाली रेल में ‘हर्ष’ तन्हाई में घंटों वक़्त बिताया है — Harsh saxena
ज़रा सी देर को हम क्या शराफ़त पर उतर आए ये बुज़दिल लोग भी हम सेे बग़ावत पर उतर आए मुझे बर्बाद करने की रहीं जब साज़िशें नाकाम मेरे दुश्मन मुझी से फिर मोहब्बत पर उतर आए तअल्लुक़ ख़त्म होने में अभी कुछ वक़्त बाक़ी है मैं इतना चाहता हूँ वो शिकायत पर उतर आए तेरी तस्वीर भी होती तो कुछ दिन काम चल जाता यूँँ ही थोड़ी न हम काफ़िर इबादत पर उतर आए अज़िय्यत में भी वो दामन इसी ख़ातिर नहीं छोड़ा कभी शायद वो ख़ुश होकर इनायत पर उतर आए ज़ियादा भी मुलाक़ातें नहीं अच्छी किसे मालूम मोहब्बत ये बदन की कब ज़रूरत पर उतर आए मियाँ अब शा'इरी छोड़ो कमाने का भी कुछ सोचो कहीं ऐसा न हो दिलबर भी दौलत पर उतर आए — Harsh saxena
सुकूँ मिलता नहीं जब भी तो माँ की याद आती है कि जैसे बारिशों की रुत में छतरी याद आती है कहीं इस शहर की आब-ओ-हवा में दम न घुट जाए कि मुझ को गाँव की सौंधी सी मिट्टी याद आती है तरक़्क़ी के शिखर पर जब पहुँचते हैं तो अक्सर ही वो ना-समझी में ज़ाया' की जवानी याद आती है दिखाऊँ इश्क़ की पाकीज़गी कैसे तुम्हें जानाँ ख़ुदा के ज़िक्र पर अक्सर तुम्हारी याद आती है भला वो बाप हाथों के किसे छाले दिखाए अब जिसे घर बैठी इक बेटी सियानी याद आती है सबब मत पूछना मुझ सेे तुम उस को याद करने का मरज़ के हद से बढ़ने पर दवाई याद आती है वो लड़की, छोड़ आया था जिसे मैं बद-गुमानी में अकेले में वही लड़की सिसकती याद आती है इसी उम्मीद पर अब तक ग़ज़ल कहता रहा हूँ मैं कभी वो पूछ ले शायद कि किस की याद आती है मुसीबत मोल लेने की है इक तरकीब ये भी 'हर्ष' उसे इतना कहो तेरी सहेली याद आती है — Harsh saxena
बस इक तुम्हारे लौटने के ए'तिबार में हम ने जवानी ज़ाया' की है इंतिज़ार में टूटा हूँ बे-हिसाब मगर इतना जान लो दाख़िल न होगा दूजा कोई इस दरार में मैं वो जिसे छला है ज़माने ने हर क़दम कैसे यक़ीन कर लूँ तिरा एक बार में क्या कीजिए जो हार गया दिल मैं ख़ार पर यूँँ तो बहुत से फूल खिले थे बहार में पहलू में उस के बैठ के ये 'इल्म हो गया पत्थर को कैसे मोम बनाते हैं प्यार में उन की यूँँ बढ़ती बे-रुख़ी से ये सुकून है कुछ तो इज़ाफ़ा हो रहा मेरी पगार में महफ़िल में ‘हर्ष’ उन की तवज्जोह को छोड़कर कुछ भी मुनाफ़ा है नहीं इस रोज़गार में — Harsh saxena
उन्हें लगता था मतले में उदासी है मगर हर एक मिसरे में उदासी है तुम्हारे सिर्फ़ लहजे में उदासी है हमारे ज़र्रे ज़र्रे में उदासी है उदासी छोड़ दें कैसे ये मुमकिन है मिली जो हम को विरसे में उदासी है बड़े दिन बा'द उस की कॉल आई है यक़ीनन आज ख़तरे में उदासी है उसे पाया है जिस ने घर वो रौशन हो मेरे तो यार कमरे में उदासी है हमारे दरमियाँ भी प्यार था लेकिन बची अब सिर्फ़ रिश्ते में उदासी है हमीं ने फेंक दी तस्वीर ग़ुस्से में हमीं कहते हैं बटुए में उदासी है उदासी से सुख़न में जान पड़ती है यूँँ ही थोड़ी न मक़्ते में उदासी है — Harsh saxena
कुछ दिन से इस दर्ज़ा सहमा सहमा हूँ जैसे उस को रुख़्सत कर के लौटा हूँ बारिश में इतनी तो ख़ैर सहूलत है रो कर अपना ग़म हल्का कर सकता हूँ मुझ सेे बिछड़ कर तुझ में भी कुछ बचा नहीं मैं भी बिन तेरे आधा सा लगता हूँ मजनूँ जैसा हाल भला कैसे कर लूँ अपने घर का मैं इकलौता बेटा हूँ बा'द तुम्हारे यार सँभलना मुश्किल है इस जुमले से रिश्ता ज़िंदा रखता हूँ उम्र से मेरी फ़नकारी को मत आँको उस्तादों से बेहतर ग़ज़लें कहता हूँ मुझ को इश्क़ के पर्चे में कुछ छूट मिले ग़ौर से देखो मैं चेहरे से पिछड़ा हूँ क़ैद करेंगी मुझ को कैसे ज़ंजीरें जिस्म नहीं हूँ मैं तो केवल साया हूँ मुझ सेे पूछो रस्ते की दुश्वारी ‘हर्ष’ मंज़िल तक मैं क़दम क़दम पर झुलसा हूँ — Harsh saxena
आँखों को उस के अलावा और कुछ दिखता नहीं है इस से ज़ाहिर है मोहब्बत का नशा उतरा नहीं है एक वो भी दौर था जब हक़ जमाता था मैं उस पर और अब ये हाल है वो शख़्स ही अपना नहीं है ऐन मुमकिन है कि वो दुख जान ही ले ले सो मैं ने एहतियातन ख़त वो उस का आख़िरी खोला नहीं है तुम कभी मुझ को कलेजे से लगाकर आज़माना झूठ कहती है ये दुनिया आदमी रोता नहीं है शे'र पर सीटी बजाकर दाद देने वालों सुन लो एक महफ़िल है अदब की ये कोई मुजरा नहीं है शा'इरी के साथ जिस का वस्ल हो जाता है उस को हिज्र के भी दौर में फिर जान का ख़तरा नहीं है — Harsh saxena
तसव्वुरात में चेहरा तेरा बनाता हूँ इसी बहाने तेरे पास बैठ जाता हूँ यूँँ तो ज़माना भी वाक़िफ़ है मेरे तेवर से पर इक निगाह है जिस सेे मैं ख़ौफ़ खाता हूँ तमाम उम्र उसी इंतिज़ार में गुज़री वो बोल कर गया था तुम रुको मैं आता हूँ न जाने कैसा अजब रोग पाल रक्खा है ख़ुशी में रोता हूँ और ग़म में मुस्कुराता हूँ बस इस लिए भी कोई शख़्स मेरा हो न सका मैं प्यार करता हूँ तो उम्र भर निभाता हूँ फिर एक दिन मेरा दुनिया से क्या यक़ीन उठा मैं तब से हर किसी का फ़ाइदा उठाता हूँ ग़ज़ल का ज़ाइक़ा बढ़ना तो लाज़िमी है ‘हर्ष’ हर एक शे'र में अपना लहू जलाता हूँ — Harsh saxena
मुझे जो रू-ब-रू देखा करेंगे यक़ीनन इश्क़ से तौबा करेंगे न जाने पेट की ख़ातिर यूँँ कब तक गला हम ख़्वाब को घोंटा करेंगे तरफ़दारी अभी जो कर रहे हैं वही किरदार को मैला करेंगे किसी दिन हार जाएँगी ये साँसें हम ऐसे मौत का पीछा करेंगे मैं सब कुछ छोड़ आया हूँ उन्हीं पर भरोसा है कि वो अच्छा करेंगे इन्हें फ़न का कोई मतलब बताए ये कब तक रील्स पर मुजरा करेंगे महक कैसे न आएगी ग़ज़ल से तुम्हें हर हर्फ़ में लिक्खा करेंगे लबों को चूमने के दौर में हम तुम्हारे हाथ पर बोसा करेंगे ज़माने के सभी दर्दों को लिखकर ग़ज़ल के नाम पर बेचा करेंगे तुम्हारे बा'द भी ये उम्र सारी तुम्हारी आस में ज़ाया' करेंगे — Harsh saxena
पिता के माथे आया बस शिकन का दुख किसी मुफ़्लिस से पूछो पैरहन का दुख सभी ने राम का ही कष्ट देखा बस था दशरथ की भी आँखों में वचन का दुख फ़क़त दिलबर के जिस्मों तक ही सीमित है न जाने क्यूँ सुख़न-वर के सुख़न का दुख मोहब्बत में कलाई काटने वाले समझते ही नहीं अक्सर बहन का दुख बिना मर्ज़ी किसी से ब्याह दी जाए वही लड़की बताएगी छुअन का दुख गले भी लग न पाए वस्ल में उस के भला अब और क्या होगा बदन का दुख यहाँ हर शख़्स ख़ूँ का प्यासा लगता है यक़ीनन मज़हबी घिन है वतन का दुख मुझे फुटपाथ का मंज़र बताता है कि मज़दूरों ने चक्खा है थकन का दुख — Harsh saxena

Nazm

“तेरे शहर नहीं आऊँगा ” ख़ुशियों के पलों से कहीं ज़ियादा मुझे इसने ग़म दिए हैं ता-'उम्र न भर पाएँगे तेरे शहर ने कुछ ऐसे ज़ख़्म दिए हैं आकार जहाँ सुकून सा मिलता था वहीं मेरा दम घुटा है यहीं आ कर जीती थी दुनिया, यहीं मेरा सब कुछ लुटा है वो आख़िरी मर्तबा मेरे साथ क्या क्या हुआ कभी न भुलाऊँगा सुनो मैं अब कभी तेरे शहर नहीं आऊँगा कोई दर नहीं छोड़ा जहाँ तुझे मैं ने माँगा न हो ऐ ख़ुदा इस जहान में मुझ-सा कोई अभागा न हो जब इल्म हुआ कि तू अब किसी और की अमानत है मेरा इश्क़ तो जैसे वहीं हार गया जिस के वास्ते जी रहा था मैं अफ़सोस वही शख़्स मुझे मार गया ख़ुद को कैसे तसल्ली दिलाऊँ, अब किसे अपना हाल-ए-दिल बताऊँगा सुनो मैं अब कभी तेरे शहर नहीं आऊँगा — Harsh saxena
“मुझे अपने इश्क़ पर नाज़ होता है” सुनो मैं तुम्हें बेहद चाहता हूँ तुम कहोगी ये कोई नई बात नहीं है हाँ ये भी सही है तुम्हारे चाहने वाले तो कई हैं पर शुक्रगुज़ार हूँ मैं उस रब का जो तुम फिर भी मुझ को चाहती हो हँसाती हो, रुलाती हो, सताती हो मगर मेरा साथ भी बख़ूबी निभाती हो ख़ुद बेवकूफ़ाना हरकत देती हो और मुझ को ही पागल ठहराती हो तुम्हारी इन्हीं नादानियों ने ही तो खींच रखा है मुझे तुम्हारी ओर हर रोज़ मन के मंदिर में तुम्हारे नाम का ही होता है शोर तुम्हारे नाम से रात, तुम्हारे नाम से कल और तुम्हारे नाम से ही मेरा आज होता है जब भी तुम मेरी वजह से मुस्कुराती हो क़सम से मुझे अपने इश्क़ पर नाज़ होता है — Harsh saxena