क़िस्मत का लिक्खा भी कब मिट पाया है
हमने भी रो रो कर काम चलाया है
हम क्या जानें जन्नत कैसी होती है
उस सेे पूछो जिसने तुमको पाया है
हम सेे पूछो प्यार की पिच के पेच-ओ-ख़म
हमने सब सेे पहले गच्चा खाया है
जिसकी ख़ातिर सब इल्ज़ाम लिए सर पे
उसने भी हम पर इल्ज़ाम लगाया है
इक तितली के उड़ जाने के मातम में
जाने सारा गुलशन क्यूँ मुरझाया है
यूँँ तो शहर-ए-दिल में भीड़ बहुत है पर
उसकी अब तक कौन जगह ले पाया है
हिज्र की दीमक ने तन का ये हाल किया
मुझपे बुढ़ापा 'उम्र से पहले आया है
अच्छे शे'र की क़ीमत हम ही जाने हैं
हमने उसको पाकर यार गँवाया है
उसके शहरस आने वाली रेल में ‘हर्ष’
तन्हाई में घंटों वक़्त बिताया है
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