वही पीछे खड़ा है मुक़्तदी बनकरजो बहकाता रहा हर पल बदी बनकरहमेशा ख़ुद को कहता हूँ ज़रा थम जाकरेगा क्या रवाँ होती नदी बनकर— Talib akbarabadi