ज़िन्दगी पूछ न बैठे तिरे बारे में कहीं
    तेरी तस्वीर बनाते हुए डर लगता है
    Shahzan Khan Shahzan'
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    ज़रा सा मुस्कुराओ रौशनी हो
    बहुत तंग आ गये हम तीरगी से
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    लोग पागल हैं जो समझते हैं
    काफ़ी मुश्किल है मुस्कुराने में
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    हम तो जाना जा रहे हैं शहर तेरा छोड़कर
    तेरी ख़ुशबू तेरी गलियाँ तेरा रस्ता छोड़कर

    कौन बतलायेगा अब ताबीर मेरे ख़्वाब की
    लोग मेरे जा रहे हैं मुझ को तन्हा छोड़कर

    मुझ को कोई ग़म नहीं है यार मेरी मौत का
    तू मगर क्यूँ भाग आया मुझको मरता छोड़कर

    शहर में लाई हैं हमको घर की जिम्मेदारियां
    वरना हम आते नहीं माँ को अकेला छोड़कर

    उसकी बातें सुन कर अब सब चारागर बेहोश हैं
    याद उसको कुछ नहीं है मेरा चेहरा छोड़कर

    ख़त्म होने का तो ये कुछ नाम तक लेती नहीं
    ज़िन्दगी हम आ गये तुझको अधूरा छोड़कर
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    Shahzan Khan Shahzan'
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    उदासी, रन्ज, पागलपन, वग़ैरा
    मोहब्बत में हमें क्या क्या मिलेगा?
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    तू वापस लौट कर आये न आये
    ये दरिया हर समय बहता मिलेगा
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    अपनी यादों के रतजगे देकर
    मेरी मुस्कान खा गया कोई
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    वो आये और मेरा हाल चाल पूछे कुछ
    बस इसलिये ही मैं बीमार होना चाहता हूँ
    Shahzan Khan Shahzan'
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    मोहब्बत में सताना आ गया है
    उसे आँखें चुराना आ गया है

    ये बच्चे अब मोहब्बत चाहते हैं
    इन्हें भी दिल लगाना आ गया है
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    Shahzan Khan Shahzan'
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    बिछड़ कर तुझ से मैं मरने लगा था
    मगर फिर मिल गया हमनाम तेरा
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