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यहाँ देखो ज़रा जलवा हमारा
हमारा शहर है रुतबा हमारा
हमारा शहर है रुतबा हमारा
हमीं पर आज भारी पड़ गया है
मुहब्बत का ये जो क़िस्सा हमारा
वो इतना ध्यान ही रखती है वैसे
कि उस से जी रहा उकता हमारा
हमारी भी अदाकारी कोई है
पकड़ लेती है वो बनना हमारा
बड़ी चोटें हैं खाई ज़िंदगी में
बता सब को रहा चेहरा हमारा
कोई भी देखने वाला नहीं है
बहुत वीरान है कमरा हमारा
हिला सकता है अच्छे अच्छों को फिर
किसी झगड़े में यूँ पड़ना हमारा
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दुख में भी जो ख़ुशी से यहाँ खिलते हैं
सारे ज़ख़्मों को आख़िर तो ये सिलते हैं
सारे ज़ख़्मों को आख़िर तो ये सिलते हैं
ये रिवाज़ अच्छा लगता है हम को कहीं
हाथ नइँ दोस्तों से गले मिलते हैं
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"सुब्ह आएगी"
फिर कोई ज़िंदगी की सुब्ह आएगी
धूप फिर से बिखर कर खिलखिलाएगी
ये जो सूखी पड़ी है ज़िंदगी की ज़मीं
एक दिन तेरी मेहनत से भीग जाएगी
हुआ ही क्या है जो तुम इतना उदास हो
इस सफ़र में ऐसी वैसी बातें तो आएँगी जाएँगी
धैर्य रखो अभी समय है ही नहीं अपना
ये दर दर की ठोकर ही तुम को जिताएगी
भरोसा रखना ख़ुद पर और ख़ुदा पर तुम
तेरी कीर्ति जहाँ में एक दिन लहलहाएगी
ये जो है ख़ाली अधूरापन भर जाएगा
फिर एक अजूबा ज़िंदगी में हो जाएगा
सोचे बैठे होंगे बुरा तुम यूँ जिसे
हादसा ही वो तुम को एक दिन हँसा जाएगा
Read Fullधूप फिर से बिखर कर खिलखिलाएगी
ये जो सूखी पड़ी है ज़िंदगी की ज़मीं
एक दिन तेरी मेहनत से भीग जाएगी
हुआ ही क्या है जो तुम इतना उदास हो
इस सफ़र में ऐसी वैसी बातें तो आएँगी जाएँगी
धैर्य रखो अभी समय है ही नहीं अपना
ये दर दर की ठोकर ही तुम को जिताएगी
भरोसा रखना ख़ुद पर और ख़ुदा पर तुम
तेरी कीर्ति जहाँ में एक दिन लहलहाएगी
ये जो है ख़ाली अधूरापन भर जाएगा
फिर एक अजूबा ज़िंदगी में हो जाएगा
सोचे बैठे होंगे बुरा तुम यूँ जिसे
हादसा ही वो तुम को एक दिन हँसा जाएगा
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"प्रतिद्वंद्वी"
मेरा क्या कोई प्रतिद्वंद्वी यहाँ होगा
मेरा तो अब ख़ुदस ही सामना होगा
मेरा लक्ष्य है ख़ुद को ही साधना
अपने अंदर प्रखर, तेज़ निखारना
मैं लगा पड़ा हूँ ख़ुद को ही परखने
मैं लगा पड़ा हूँ ख़ुद को सँवारने
मुझे पड़ी नहीं ख़ुद को श्रेष्ठ बताने की
दूसरों को नीचा, अपने से कम आँकने की
मैं वो जिस का स्वयं से ही संघर्ष है
मैं वो सूरज जो स्वयं उदय अस्त होता है
मैं वो नदी जो स्वयं मार्ग बनाती जाती है
मैं वो हवा जो निरंतर चलती जाती है
मैं ख़ुद का ही प्रतिद्वंद्वी हूँ
है अजब होड़ इस युग में आगे पीछे रहने की
अपनी अपनी प्रशंसा अपने ही मुँह से करने की
मैं इस होड़ में सब से पीछे हूँ
मैं इन सब चीज़ों में सब से नीचे हूँ
देख रहे हो तुम कि बाहरस शांत और निष्काम
पर पता तुम्हें मेरे अंदर चल रहा है महासंग्राम
मेरा क्या कोई प्रतिद्वंद्वी यहाँ होगा
मेरा तो अब ख़ुदस ही सामना होगा
Read Fullमेरा तो अब ख़ुदस ही सामना होगा
मेरा लक्ष्य है ख़ुद को ही साधना
अपने अंदर प्रखर, तेज़ निखारना
मैं लगा पड़ा हूँ ख़ुद को ही परखने
मैं लगा पड़ा हूँ ख़ुद को सँवारने
मुझे पड़ी नहीं ख़ुद को श्रेष्ठ बताने की
दूसरों को नीचा, अपने से कम आँकने की
मैं वो जिस का स्वयं से ही संघर्ष है
मैं वो सूरज जो स्वयं उदय अस्त होता है
मैं वो नदी जो स्वयं मार्ग बनाती जाती है
मैं वो हवा जो निरंतर चलती जाती है
मैं ख़ुद का ही प्रतिद्वंद्वी हूँ
है अजब होड़ इस युग में आगे पीछे रहने की
अपनी अपनी प्रशंसा अपने ही मुँह से करने की
मैं इस होड़ में सब से पीछे हूँ
मैं इन सब चीज़ों में सब से नीचे हूँ
देख रहे हो तुम कि बाहरस शांत और निष्काम
पर पता तुम्हें मेरे अंदर चल रहा है महासंग्राम
मेरा क्या कोई प्रतिद्वंद्वी यहाँ होगा
मेरा तो अब ख़ुदस ही सामना होगा
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नज़्म: सिलसिले ट्रेन के
मुसलसल अपनों से मिलते बिछड़ते हुए लोग
कौन होते हैं ये ट्रेन पे चढ़ते उतरते हुए लोग
कही आँख में मुलाक़ात की ख़ुशी लिए
कही आँख में विदाई ग़म लिए
हाथ को हवा में लहराते हुए लोग
बड़े अजीब सिलसिले होते हैं ट्रेन के
हमेशा की तरह वक़्त की रफ़्तार के साथ
चंद दिन के गुज़ारे को हाथ में लगेज लिए
ट्रेन की तरफ़ बेतहाशा दौड़ते हुए लोग
कही खिड़कियों से झाँकती अपनों को
ढूँढ़ती हुई उम्मीद की आँखें
वही नम आँखों से आख़िरी बार
अपनों को देखती उदास आँखें
बड़ा अलग एहसास होता है
इस सफ़र का पूछो मत
कहीं ख़ुशी से घर जाते हुए लोग
कही घर से वापस आते हुए
स्टेशन पे उतरते हुए लोग
बड़े अजीब सिलसिले होते हैं ट्रेन के
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