Karan Shukla

Top 10 of Karan Shukla

    गली तक बस मुझे जाना पड़ेगा
    उसे फिर छत पे तो आना पड़ेगा

    खिलाऊँगी जो अपने हाथ से मैं
    तो उसको ज़हर भी खाना पड़ेगा

    मकाँ खाली गई करके वो दिल का
    सो इक और लड़की को लाना पड़ेगा

    ये दिल का बोझ कम करने को साथी
    तराना तो कोई गाना पड़ेगा
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    Karan Shukla
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    यहाँ देखो ज़रा जलवा हमारा
    हमारा शहर है रुतबा हमारा

    हमीं पर आज भारी पड़ गया है
    मुहब्बत का ये जो क़िस्सा हमारा

    वो इतना ध्यान ही रखती है वैसे
    कि उससे जी रहा उकता हमारा 

    हमारी भी अदाकारी कोई है
    पकड़ लेती है वो बनना हमारा

    बड़ी चोटें हैं खाई ज़िंदगी में
    बता सबको रहा चेहरा हमारा

    कोई भी देखने वाला नहीं है
    बहुत वीरान है कमरा हमारा

    हिला सकता है अच्छे अच्छों को फिर
    किसी झगड़े में यूँ पड़ना हमारा
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    Karan Shukla
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    दुख में भी जो ख़ुशी से यहाँ खिलते हैं
    सारे ज़ख़्मों को आख़िर तो ये सिलते हैं

    ये रिवाज़ अच्छा लगता है हमको कहीं
    हाथ नइँ दोस्तों से गले मिलते हैं
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    Karan Shukla
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    "सुबह आएगी"
    फिर कोई ज़िंदगी की सुबह आएगी
    धूप फिर से बिखर कर खिलखिलाएगी

    ये जो सूखी पड़ी है ज़िंदगी की ज़मीं
    एक दिन तेरी मेहनत से भीग जाएगी

    हुआ ही क्या है जो तुम इतना उदास हो
    इस सफ़र में ऐसी वैसी बातें तो आएँगी जाएँगी

    धैर्य रखो अभी समय है ही नहीं अपना
    ये दर दर की ठोकर ही तुमको जिताएगी

    भरोसा रखना ख़ुद पर और ख़ुदा पर तुम
    तेरी कीर्ति जहाँ में एक दिन लहलहाएगी

    ये जो है ख़ाली अधूरापन भर जाएगा
    फिर एक अजूबा ज़िंदगी में हो जाएगा

    सोचे बैठे होंगे बुरा तुम यूँ जिसे
    हादसा ही वो तुमको एक दिन हँसा जाएगा
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    Karan Shukla
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    "प्रतिद्वंद्वी"
    मेरा क्या कोई प्रतिद्वंद्वी यहाँ होगा
    मेरा तो अब ख़ुद से ही सामना होगा

    मेरा लक्ष्य है ख़ुद को ही साधना
    अपने अंदर प्रखर, तेज़ निखारना

    मैं लगा पड़ा हूँ ख़ुद को ही परखने
    मैं लगा पड़ा हूँ ख़ुद को सँवारने

    मुझे पड़ी नहीं ख़ुद को श्रेष्ठ बताने की
    दूसरों को नीचा, अपने से कम आँकने की

    मैं वो जिसका स्वयं से ही संघर्ष है
    मैं वो सूरज जो स्वयं उदय अस्त होता है

    मैं वो नदी जो स्वयं मार्ग बनाती जाती है
    मैं वो हवा जो निरंतर चलती जाती है

    मैं ख़ुद का ही प्रतिद्वंद्वी हूँ

    है अजब होड़ इस युग में आगे पीछे रहने की
    अपनी अपनी प्रशंसा अपने ही मुँह से करने की

    मैं इस होड़ में सबसे पीछे हूँ
    मैं इन सब चीज़ों में सबसे नीचे हूँ

    देख रहे हो तुम कि बाहर से शांत और निष्काम
    पर पता तुम्हें मेरे अंदर चल रहा है महासंग्राम

    मेरा क्या कोई प्रतिद्वंद्वी यहाँ होगा
    मेरा तो अब ख़ुद से ही सामना होगा
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    Karan Shukla
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    कमी कैसी मिरे अंदर गया तू छोड़ कर अपनी
    कि अब तेरी कमी को जाने कितने लोग भरते हैं
    Karan Shukla
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    "हमारी एक तस्वीर"

    वैसे तो कुछ भी रह नहीं गया हाथ में
    बस एक तस्वीर बची है हम दोनों की साथ में
    वही तस्वीर जिसे देखकर उन दिनों को
    उन पलों को उन रंगों को और उस ख़ुश्बू
    उस वक़्त को महसूस किया जा सकता है
    कैसे अपनी पूरी मुस्कुराहट को होठों में
    दबाए हुए कैमरे की तरफ़ देखते चेहरे
    जो तस्वीर को अच्छा बनाने की कोशिश
    में दिखाई देते हैं जिन्हें कल की कोई
    ख़बर नहीं थी कि क्या होगा।
    सोचें तुझे तो लगता नहीं जुदा हुए ज़माना हुआ
    मगर तस्वीर देखकर वक़्त का अंदाज़ा होता है
    वो तस्वीर जो उम्मीद है मेरी
    वो तस्वीर जो कमाई है मेरी
    वो तस्वीर जो ख़ुशी है मेरी
    वो तस्वीर जो सबकुछ है मेरी
    वैसे बहुत वक़्त नहीं बिता पाया मैं तेरे साथ
    मगर एक तस्वीर में हम दोनों आज भी हैं साथ
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    Karan Shukla
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    जो था लौटा वो दिया हमने ख़ुशी से
    उस मुहब्बत का निशाँ कोई बचा नइँ
    Karan Shukla
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    नज़्म: सिलसिले ट्रेन के

    मुसलसल अपनों से मिलते बिछड़ते हुए लोग
    कौन होते हैं ये ट्रेन पे चढ़ते उतरते हुए लोग
    कही आँख में मुलाक़ात की ख़ुशी लिए
    कही आँख में विदाई ग़म लिए
    हाथ को हवा में लहराते हुए लोग
    बड़े अजीब सिलसिले होते हैं ट्रेन के
    हमेशा की तरह वक़्त की रफ़्तार के साथ
    चंद दिन के गुज़ारे को हाथ में लगेज लिए
    ट्रेन की तरफ़ बेतहाशा दौड़ते हुए लोग
    कही खिड़कियों से झाँकती अपनों को
    ढूँढ़ती हुई उम्मीद की आँखें
    वही नम आँखों से आख़िरी बार
    अपनों को देखती उदास आँखें
    बड़ा अलग एहसास होता है
    इस सफ़र का पूछो मत

    कहीं ख़ुशी से घर जाते हुए लोग
    कही घर से वापस आते हुए
    स्टेशन पे उतरते हुए लोग
    बड़े अजीब सिलसिले होते हैं ट्रेन के
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    Karan Shukla
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    जो होगी रौशनी दिल में दिवाली हम मनाएँगे
    तुम्हें अच्छी जो लगती हो मिठाई हम खिलाएँगे

    नहीं भरना मिरे हिस्से का रंगोली में कोई रंग
    उन्हीं रंगों से मेरी ज़िंदगी में रंग आएँगे
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    Karan Shukla
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