दुख में भी जो ख़ुशी से यहाँ खिलते हैंसारे ज़ख़्मों को आख़िर तो ये सिलते हैंये रिवाज़ अच्छा लगता है हम को कहींहाथ नइँ दोस्तों से गले मिलते हैं— Karan Shukla