Karan Shukla

Karan Shukla

@Writerkaranshukla

Karan Shukla shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Karan Shukla's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

कमी कैसी मिरे अंदर गया तू छोड़ कर अपनी कि अब तेरी कमी को जाने कितने लोग भरते हैं — Karan Shukla
जो था लौटा वो दिया हम ने ख़ुशी से उस मुहब्बत का निशाँ कोई बचा नइँ — Karan Shukla

Ghazal

तिरे हाथों से यूँँ छोड़ा गया हूँ मैं कि अब तो हर तरफ़ बिखरा पड़ा हूँ मैं हराना ज़िंदगी आसाँ नहीं इतना बहुत गिरकर ज़मीं से तो उठा हूँ मैं जिसे यूँँ ही रखा रहने दिया हो बस तिरे लब तक न आई वो दवा हूँ मैं समय का फ़ैसला हक़ में नहीं वर्ना उड़ा इक बार जो फिर तो हवा हूँ मैं कभी महसूस करना अपनी साँसों में कि लेता साँस क्या अब भी बचा हूँ मैं हराया वक़्त के हाथों गया बेशक मगर तेरे लिए अब भी बड़ा हूँ मैं यही तेरा नहीं इक ग़म यहाँ अब तो तमाशे कितने थे जिन से लड़ा हूँ मैं वो अपनी रौशनी अक्सर दिखाता है कभी रौशन जिसे करते बुझा हूँ मैं उदासी के परे भी दुनिया कोई थी जिसे ख़्वाबों का मंज़र कह रहा हूँ मैं वहाँ तू जा नहीं सकता कभी सुन ले कहीं फिर जिस बुलंदी से गिरा हूँ मैं ख़ुशी से शहर सारा घूमा है फिर आज मगर उस इक गली से तो ख़फ़ा हूँ मैं हुआ क्या है दिवानेपन को मेरे अब न जाने उस सेे क्यूँँ लड़ भिड़ रहा हूँ मैं — Karan Shukla

Nazm

नहीं मैं राम नहीं मैं राम जो हँसते हुए सब दुख ये सह जाऊँ नहीं मैं राम जो शबरी के जूठे बेर तक खाऊँ नहीं मैं राम सा भाई नहीं मैं राम सा त्यागी नहीं मैं उन के जैसा आज्ञाकारी नहीं मैं उन सा मर्यादा का पालन करने वाला हूँ नहीं मैं उन के जैसा सबका प्यारा हूँ नहीं मैं धर्म पर यूँँ चलने वाला हूँ नहीं मैं उन के जैसा हर किसी को मान देता हूँ नहीं मैं वो जो केवट को गले अपने लगाता है जो ऊँचा नीचा करने को मना करता बड़ा छोटा भुलाकर जो दया करता नहीं मैं राम सा भटकू यहाँ वन में नहीं है राम सा धीरज यहाँ मुझ में नहीं है राम सा आदर यहाँ मुझ में नहीं है राम सा संकल्प भी मुझ में मैं इक मामूली सा मानव जो लोभी है जो झूठा है दिखावा है बदलता है बहुत ही आलसी भी है जो जपता राम तो है राम पथ पे चलने से डरता भला क्यूँँ है — Karan Shukla
"हमारी एक तस्वीर" वैसे तो कुछ भी रह नहीं गया हाथ में बस एक तस्वीर बची है हम दोनों की साथ में वही तस्वीर जिसे देख कर उन दिनों को उन पलों को उन रंगों को और उस ख़ुश्बू उस वक़्त को महसूस किया जा सकता है कैसे अपनी पूरी मुस्कुराहट को होंठों में दबाए हुए कैमरे की तरफ़ देखते चेहरे जो तस्वीर को अच्छा बनाने की कोशिश में दिखाई देते हैं जिन्हें कल की कोई ख़बर नहीं थी कि क्या होगा। सोचें तुझे तो लगता नहीं जुदा हुए ज़माना हुआ मगर तस्वीर देख कर वक़्त का अंदाज़ा होता है वो तस्वीर जो उम्मीद है मेरी वो तस्वीर जो कमाई है मेरी वो तस्वीर जो ख़ुशी है मेरी वो तस्वीर जो सब कुछ है मेरी वैसे बहुत वक़्त नहीं बिता पाया मैं तेरे साथ मगर एक तस्वीर में हम दोनों आज भी हैं साथ — Karan Shukla
"कमाल हो तुम" मैं नहीं जानता कौन हो तुम पर जो भी हो कमाल हो तुम तुम्हें देख कर जो दौड़ती है रगों में ख़ुशी तुम्हें देख कर भूल जाता हूँ दुनिया कि सारी उदासी चाँद तारों झील दरिया ख़ुशबू फूल बारिश बादल से परे है और ख़ुदा से जो अता है वो सब सेे नायाब तोहफ़ा हो तुम कोई आभा जो तुम्हारे चेहरे पे रहती है जहाँ के सारे रंग समेट के जो सजती है वो फ़ज़ा का मौसम का सुनहरा ख़्वाब हो तुम जो सुकूँ दे रूह को वो शा'इरी हो तुम नज़र जो आए फूलों में वो ताज़गी हो तुम जिस की आँखों में क़ायनात नज़र आ जाए बिखरते गेसू जिस के जादू बिखरा जाए वो हया वो हँसी वो चीज़ हो तुम मैं नहीं जानता कौन हो तुम पर जो भी हो कमाल हो तुम — Karan Shukla
"प्रतिद्वंद्वी" मेरा क्या कोई प्रतिद्वंद्वी यहाँ होगा मेरा तो अब ख़ुदस ही सामना होगा मेरा लक्ष्य है ख़ुद को ही साधना अपने अंदर प्रखर, तेज़ निखारना मैं लगा पड़ा हूँ ख़ुद को ही परखने मैं लगा पड़ा हूँ ख़ुद को सँवारने मुझे पड़ी नहीं ख़ुद को श्रेष्ठ बताने की दूसरों को नीचा, अपने से कम आँकने की मैं वो जिस का स्वयं से ही संघर्ष है मैं वो सूरज जो स्वयं उदय अस्त होता है मैं वो नदी जो स्वयं मार्ग बनाती जाती है मैं वो हवा जो निरंतर चलती जाती है मैं ख़ुद का ही प्रतिद्वंद्वी हूँ है अजब होड़ इस युग में आगे पीछे रहने की अपनी अपनी प्रशंसा अपने ही मुँह से करने की मैं इस होड़ में सब सेे पीछे हूँ मैं इन सब चीज़ों में सब सेे नीचे हूँ देख रहे हो तुम कि बाहरस शांत और निष्काम पर पता तुम्हें मेरे अंदर चल रहा है महासंग्राम मेरा क्या कोई प्रतिद्वंद्वी यहाँ होगा मेरा तो अब ख़ुदस ही सामना होगा — Karan Shukla
नज़्म: सिलसिले ट्रेन के मुसलसल अपनों से मिलते बिछड़ते हुए लोग कौन होते हैं ये ट्रेन पे चढ़ते उतरते हुए लोग कही आँख में मुलाक़ात की ख़ुशी लिए कही आँख में विदाई ग़म लिए हाथ को हवा में लहराते हुए लोग बड़े अजीब सिलसिले होते हैं ट्रेन के हमेशा की तरह वक़्त की रफ़्तार के साथ चंद दिन के गुज़ारे को हाथ में लगेज लिए ट्रेन की तरफ़ बेतहाशा दौड़ते हुए लोग कही खिड़कियों से झाँकती अपनों को ढूँढ़ती हुई उम्मीद की आँखें वही नम आँखों से आख़िरी बार अपनों को देखती उदास आँखें बड़ा अलग एहसास होता है इस सफ़र का पूछो मत कहीं ख़ुशी से घर जाते हुए लोग कही घर से वापस आते हुए स्टेशन पे उतरते हुए लोग बड़े अजीब सिलसिले होते हैं ट्रेन के — Karan Shukla