nazm silsile train ke | नज़्म: सिलसिले ट्रेन के

  - Karan Shukla

नज़्म: सिलसिले ट्रेन के


मुसलसल अपनों से मिलते बिछड़ते हुए लोग
कौन होते हैं ये ट्रेन पे चढ़ते उतरते हुए लोग
कही आँख में मुलाक़ात की ख़ुशी लिए
कही आँख में विदाई ग़म लिए
हाथ को हवा में लहराते हुए लोग
बड़े अजीब सिलसिले होते हैं ट्रेन के
हमेशा की तरह वक़्त की रफ़्तार के साथ
चंद दिन के गुज़ारे को हाथ में लगेज लिए
ट्रेन की तरफ़ बेतहाशा दौड़ते हुए लोग
कही खिड़कियों से झाँकती अपनों को
ढूँढ़ती हुई उम्मीद की आँखें
वही नम आँखों से आख़िरी बार
अपनों को देखती उदास आँखें
बड़ा अलग एहसास होता है
इस सफ़र का पूछो मत

कहीं ख़ुशी से घर जाते हुए लोग
कही घर से वापस आते हुए
स्टेशन पे उतरते हुए लोग
बड़े अजीब सिलसिले होते हैं ट्रेन के

  - Karan Shukla

Khafa Shayari

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