हर क़दम पे इक नया धक्का लगा है
ज़िंदगी ये ज़िंदगी भी क्या सज़ा है
लोग पागल हैं उधर ही भागते हैं
बस जहाँ झूठों ने झूठा ही लिखा है
क्या किसी को फ़र्क भी पड़ता है इस से
साथ मेरे हादसा जो कल हुआ है
आपसे ये इश्क़ कर के देखने में
उम्र भर का ज़ख़्म हम को यूँ मिला है
क्या भरोसा आदमी का करना साहब
दाम अच्छे मिलते ही फ़ौरन बिका है
हाथ सब के जुर्म में डूबे हुए हैं
पर यहाँ सब कहते हम ने क्या किया है
आज कल के रिश्तों ने तो रिश्तों को ही
अपना अपना बोलकर धोखा दिया है
— Karan Shukla















