मिल रहे दुख दर्द ये किस के मुताबिक़

हो ख़ुदा कुछ नइँ रहा तेरे मुताबिक़

जो मुहब्बत हो मुहब्बत ही रहो तुम
लेक्चर हम को न दो माँ के मुताबिक़

किस को देती ज़िंदगी इतनी सहूलत
कौन जी पाया यहाँ अपने मुताबिक़

ख़ौफ़ खाता है ख़ुदा भी आदमी से
क्या नहीं होता भला पैसे मुताबिक़

इस लिए भी टूटते थे रिश्ते मेरे
मैं कभी चल पाया नइँ वादे मुताबिक़

अब कहाँ से ऐसा झुमका यार लाएँ
जो हो बिल्कुल तेरे बस चेहरे मुताबिक़

— Karan Shukla

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