तिरे हाथों से यूँँ छोड़ा गया हूँ मैं
कि अब तो हर तरफ़ बिखरा पड़ा हूँ मैं
हराना ज़िंदगी आसाँ नहीं इतना
बहुत गिरकर ज़मीं से तो उठा हूँ मैं
जिसे यूँँ ही रखा रहने दिया हो बस
तिरे लब तक न आई वो दवा हूँ मैं
समय का फ़ैसला हक़ में नहीं वर्ना
उड़ा इक बार जो फिर तो हवा हूँ मैं
कभी महसूस करना अपनी साँसों में
कि लेता साँस क्या अब भी बचा हूँ मैं
हराया वक़्त के हाथों गया बेशक
मगर तेरे लिए अब भी बड़ा हूँ मैं
यही तेरा नहीं इक ग़म यहाँ अब तो
तमाशे कितने थे जिनसे लड़ा हूँ मैं
वो अपनी रौशनी अक्सर दिखाता है
कभी रौशन जिसे करते बुझा हूँ मैं
उदासी के परे भी दुनिया कोई थी
जिसे ख़्वाबों का मंज़र कह रहा हूँ मैं
वहाँ तू जा नहीं सकता कभी सुन ले
कहीं फिर जिस बुलंदी से गिरा हूँ मैं
ख़ुशी से शहर सारा घूमा है फिर आज
मगर उस इक गली से तो ख़फ़ा हूँ मैं
हुआ क्या है दिवानेपन को मेरे अब
न जाने उस सेे क्यूँँ लड़ भिड़ रहा हूँ मैं
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