गली तक बस मुझे जाना पड़ेगा
उसे फिर छत पे तो आना पड़ेगा
खिलाऊँगी जो अपने हाथ से मैं
तो उस को ज़हर भी खाना पड़ेगा
मकाँ ख़ाली गई कर के वो दिल का
सो इक और लड़की को लाना पड़ेगा
ये दिल का बोझ कम करने को साथी
तराना तो कोई गाना पड़ेगा
— Karan Shukla
उसे फिर छत पे तो आना पड़ेगा
खिलाऊँगी जो अपने हाथ से मैं
तो उस को ज़हर भी खाना पड़ेगा
मकाँ ख़ाली गई कर के वो दिल का
सो इक और लड़की को लाना पड़ेगा
ये दिल का बोझ कम करने को साथी
तराना तो कोई गाना पड़ेगा
Other ghazal from the same pen
Voices in the same orbit
Poetry by feeling