गली तक बस मुझे जाना पड़ेगा
उसे फिर छत पे तो आना पड़ेगा
खिलाऊँगी जो अपने हाथ से मैं
तो उसको ज़हर भी खाना पड़ेगा
मकाँ ख़ाली गई करके वो दिल का
सो इक और लड़की को लाना पड़ेगा
ये दिल का बोझ कम करने को साथी
तराना तो कोई गाना पड़ेगा
As you were reading Shayari by Karan Shukla
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