काला चेहरा लगता है
ग़म का साया लगता है
उस से यारी रखने में
अपना पैसा लगता है
भूलें तो कैसे भूलें
यार ज़माना लगता है
अब उस का पीछा करना
एक तमाशा लगता है
उस के हाथ में चाकू भी
आख़िर गुल सा लगता है
फंदे पर चढ़ने वालों
घर को धक्का लगता है
पहली दफ़ा में हर कोई
अक्सर अच्छा लगता है
लड़की वालों से पूछो
घर क्यूँ सूना लगता है
— Karan Shukla















