मेरा साहिल कोई और है
मुझे हासिल कोई और है
मुझे अब देख कर रो मत
तेरे क़ाबिल कोई और है
ये तो हालात हैं वरना
मिरी मंज़िल कोई और है
बहादुर हैं ये रोते लोग
यहाँ बुज़दिल कोई और है
जहाँ तुम थे 'करन' देखो
वहाँ दाख़िल कोई और है
— Karan Shukla
मुझे हासिल कोई और है
मुझे अब देख कर रो मत
तेरे क़ाबिल कोई और है
ये तो हालात हैं वरना
मिरी मंज़िल कोई और है
बहादुर हैं ये रोते लोग
यहाँ बुज़दिल कोई और है
जहाँ तुम थे 'करन' देखो
वहाँ दाख़िल कोई और है
Other ghazal from the same pen
Voices in the same orbit
Poetry by feeling