pratidvandvi | "प्रतिद्वंद्वी"

  - Karan Shukla

"प्रतिद्वंद्वी"

मेरा क्या कोई प्रतिद्वंद्वी यहाँ होगा
मेरा तो अब ख़ुदस ही सामना होगा

मेरा लक्ष्य है ख़ुद को ही साधना
अपने अंदर प्रखर, तेज़ निखारना

मैं लगा पड़ा हूँ ख़ुद को ही परखने
मैं लगा पड़ा हूँ ख़ुद को सँवारने

मुझे पड़ी नहीं ख़ुद को श्रेष्ठ बताने की
दूसरों को नीचा, अपने से कम आँकने की

मैं वो जिसका स्वयं से ही संघर्ष है
मैं वो सूरज जो स्वयं उदय अस्त होता है

मैं वो नदी जो स्वयं मार्ग बनाती जाती है
मैं वो हवा जो निरंतर चलती जाती है

मैं ख़ुद का ही प्रतिद्वंद्वी हूँ

है अजब होड़ इस युग में आगे पीछे रहने की
अपनी अपनी प्रशंसा अपने ही मुँह से करने की

मैं इस होड़ में सब सेे पीछे हूँ
मैं इन सब चीज़ों में सब सेे नीचे हूँ

देख रहे हो तुम कि बाहरस शांत और निष्काम
पर पता तुम्हें मेरे अंदर चल रहा है महासंग्राम

मेरा क्या कोई प्रतिद्वंद्वी यहाँ होगा
मेरा तो अब ख़ुदस ही सामना होगा

  - Karan Shukla

Khushboo Shayari

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