Charagh Sharma

Charagh Sharma

@charagh-sharma

Charagh Sharma shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Charagh Sharma's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

126

Content

52

Likes

1578

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal
  • Nazm

Sher

उँगलियों पर गिने जा सकते हैं अब अच्छे लोग उँगलियों में गर अँगूठे न गिनो भी तो भी — Charagh Sharma
अहमियत अब तेरी कॉलर के बटन जितनी है न हो तो भी कोई दिक़्क़त नहीं हो भी तो भी — Charagh Sharma
बनाओ ताजमहल के ब-जाए ताश महल तमाम उम्र मुहब्बत करो गिराओ बनाओ — Charagh Sharma
"उस के हाथ में फूल है" मत कहिए, कहिए उस का हाथ है फूल को फूल बनाने में — Charagh Sharma
वैसे तो ज़ेवरों की ज़रूरत नहीं तुझे फिर भी अगर ये फूल तेरे काम आ सके — Charagh Sharma
ख़ुदा, फ़रिश्ते, पयम्बर, बशर किसी का नहीं मुझे लिहाज़ तो सबका है डर किसी का नहीं — Charagh Sharma
तितली से दोस्ती न गुलाबों का शौक़ है मेरी तरह उसे भी किताबों का शौक़ है — Charagh Sharma
यही नुस्ख़ा बचा था आज़माए जा रहा हूँ वो चलता जा रहा है और मैं छींके जा रहा हूँ — Charagh Sharma
इस दिल की ईंट ईंट तेरे बा'द हिल गई तू चल दिया तो इश्क़ की बुनियाद हिल गई — Charagh Sharma
शतक बनाने को बस एक रन बनाना है वो दोस्त बन गई है अब दुल्हन बनाना है — Charagh Sharma
कोई ख़त-वत नहीं फाड़ा कोई तोहफ़ा नहीं तोड़ा कि वो देखे तो ख़ुद सोचे कि दिल तोड़ा, नहीं तोड़ा? — Charagh Sharma
उदासी इक समुंदर है कि जिस की तह नहीं है मैं नीचे और नीचे और नीचे जा रहा हूँ — Charagh Sharma
इतने अफ़सुर्दा नहीं हैं हम कि कर लें ख़ुद-कुशी और न इतने ख़ुश कि सच में मरने की ख़्वाहिश न हो — Charagh Sharma
वो शांत बैठा है कब से मैं शोर क्यूँ न करूँ बस एक बार वो कह दे कि चुप तो चूँ न करूँ — Charagh Sharma
तुझे बहुत शौक़ था मोहब्बत की गर्म लपटों से खेलने का ले जल गई न हथेली अब ख़ुश कहा था मैं ने चराग़ रख दे — Charagh Sharma
जो लोग ख़ुद न करते थे होंठों से पान साफ़ पलकों से कर रहे हैं तेरा पायदान साफ़ — Charagh Sharma
नापता हूँ मैं ख़यालात की गहराई को कौन समझेगा मेरी बात की गहराई को — Charagh Sharma
रुकें तो धूप से नज़रें बचाते रहते हैं चलें तो कितने दरख़्त आते जाते रहते हैं — Charagh Sharma
याद भूले हुए लोगों को किया जाता है भूल जाओ कि तुम्हें याद किया जाएगा — Charagh Sharma

Ghazal

वो हँस के देखती होती तो उस सेे बात करते कोई उम्मीद भी होती तो उस सेे बात करते हम स्टेशन से बाहर आए इस अफ़सोस के साथ वो लड़की अजनबी होती तो उस सेे बात करते हमारे जाम आधी हौसला-अफ़ज़ाई कर पाए अगर उस ने भी पी होती तो उस सेे बात करते हम उस के झुमकों की लरज़िश पे अक्सर सोचते हैं हवा से दोस्ती होती तो उस सेे बात करते ये ख़ामोशी भी क्या है गुफ़्तगू की इंतेहा है कोई बात अनकही होती तो उस सेे बात करते तवज्जोह से बहुत शर्माती है आवाज़ अपनी अगर वो सो रही होती तो उस सेे बात करते किसी से बात करना इतना मुश्किल भी नहीं था किसी ने बात की होती तो उस सेे बात करते — Charagh Sharma
वो सिर्फ़ क़िस्से कहानियों के मुआ'मले थे चराग़ रख दे चराग़ घिसने से कोई जिन-विन नहीं निकलते चराग़ रख दे हमारी मा'सूमियत तो देखो रख आए दिल हम हुज़ूर-ए-जानाँ कि जैसे कोई ख़ुदा का बंदा हवा के आगे चराग़ रख दे किसी के साए को क़ैद करने का इक तरीक़ा बता रहा हूँ इक उस के आगे चराग़ रख दे इक उस के पीछे चराग़ रख दे तुझे बहुत शौक़ था मोहब्बत की गर्म लपटों से खेलने का ले जल गई न हथेली अब ख़ुश कहा था मैं ने चराग़ रख दे चराग़ ले के भी ढूँडने से चराग़ जैसा नहीं मिलेगा सो रखनी है तो चराग़ से रख नहीं तो प्यारे चराग़ रख दे चराग़ रौशन ज़रूर कर तो पर इस से पहले ख़ुदा की ख़ातिर यहाँ पे फैला है जो अँधेरा समेट ज़ेर-ए-चराग़ रख दे मैं दिल की बातों में आ गया और उठा के ले आया उस की पायल दिमाग़ देता रहा सदाएँ चराग़ रख दे चराग़ रख दे — Charagh Sharma
चमन में कौन बबूलों की डाल खींचता है यहाँ जो आता है फूलों के गाल खींचता है वो तीर बा'द में पहले सवाल खींचता है सवाल भी जो समाअ'त की खाल खींचता है ऐ प्यार बाँटने वाले मैं ख़ूब जानता हूँ कि कितनी देर में मछवारा जाल खींचता है निकल भी सकता हूँ क़ैद-ए-तख़य्युलात से गर वो शख़्स खींच ले जिस का ख़याल खींचता है मैं उस के आगे नहीं खींचता नियाम से तेग़ वो शेर-शाह जो दुश्मन की ढाल खींचता है ये सर्द सुब्ह में सोया शरारती सूरज बस आँख खुलते ही परियों की शाल खींचता है मैं होश-मंद हूँ ख़ुद भी सो मेरी ग़ज़लों में न रक़्स करता है आशिक़ न बाल खींचता है — Charagh Sharma
औरों की प्यास और है और उस की प्यास और कहता है हर गिलास पे बस इक गिलास और ख़ुद को कई बरस से ये समझा रहे हैं हम काटी है इतनी उम्र तो दो-चार मास और पहले ही कम हसीन कहाँ था तुम्हारा ग़म पहना दिया है उस को ग़ज़ल का लिबास और टकरा रही है साँस मिरी उस की साँस से दिल फिर भी दे रहा है सदा और पास और अल्लाह उस का लहजा-ए-शीरीं कि क्या कहूँ वल्लाह उस पे उर्दू ज़बाँ की मिठास और बाँधा है अब नक़ाब तो फिर कस के बाँध ले इक घूँट पी के ये न हो बढ़ जाए प्यास और 'ग़ालिब' हयात होते तो करते ये ए'तिराफ़ दौर-ए-चराग़' में है ग़ज़ल का क्लास और — Charagh Sharma
अब के मिली शिकस्त मेरी ओर से मुझे जितवा दिया गया किसी कमज़ोर से मुझे अल्फ़ाज़ ढ़ोने वाली इक आवाज़ था मैं बस फिर उस ने सुनके शे'र किया शोर से मुझे तुझ को न पाके ख़ुश हूँ कि खोने का डर नहीं ग़ुरबत बचा रही है हर इक चोर से मुझे जो शाख़ पर हैं तेरे गुज़रने के बावजूद वो फूल चुभ रहे हैं बहुत ज़ोर से मुझे मैं चाहता था और कुछ ऊँचा हो आसमान क़ुदरत ने पंख सौंप दिए मोर से मुझे मैं ने क़ुबूल कर लिया चुप-चाप वो गुलाब जो शाख़ दे रही थी तेरी ओर से मुझे हल्के से उस ने पूछा किसे दूँ मैं अपना दिल मैं मन ही मन में चीख़ा बहुत ज़ोर से "मुझे" — Charagh Sharma
मैं रोज़गार-ए-मुहब्बत में कम पगार पे था और इतनी कम कि ग़ज़ल का गुज़र उधार पे था हमारा इश्क़ भी याराने की कगार पे था जब उस ने "प्यार" कहा था तो ज़ोर "यार" पे था किसे ख़बर थी कि दरवाज़ा भी खुला हुआ है सभी का ध्यान तो दीवार की दरार पे था मुझे ख़रीदने दो तीन लोग आए थे और उन में से भी मेरा क़र्ज़ तीन-चार पे था मैं जिस गुलाब की ख़ातिर था ख़ार की ज़द में उसे भी मुझ पे भरोसा नहीं था ख़ार पे था बता रहा था अँधेरा बहुत है दुनिया में वो इक चराग़ जो मंसूर के मज़ार पे था हुआ था क़त्ल कल उस के किसी दिवाने का ख़ुदा का शुक्र! कि इल्ज़ाम ख़ाकसार पे था — Charagh Sharma

Nazm

"मिरा कमरे से बस नींदों का रिश्ता था" मिरा कमरे से बस नींदों का रिश्ता था और उस ज़ीने से ख़्वाबों का जो लहराता हुआ जाता था छत तक वो छत जहाँ से आसमाँ नज़दीक था जहाँ आराम फ़रमाती थीं आँखें वो आँखें जिन में सपने थे वो सपने जिन में दुनिया थी वो दुनिया जिस में सब कुछ था वही छत जहाँ पर एक चिड़िया की सुरीली चहचहाहट थी पतंगों की सजावट थी फ़लक की झिलमिलाहट थी मगर अफ़सोस वो चिड़िया जो सवेरे घर में सब सेे पहले उठती थी किसे मा'लूम था इक दिन वो ज़ेर-ए-दाम आएगी पतंग-ए-काग़ज़ी जो आसमाँ छूने ही वाली थी किसे मा'लूम था वो लौट कर नाकाम आएगी फ़लक जिस पर तमन्नाओं के कितने चाँद रौशन थे किसे मा'लूम था उस पर अमावस की भी कोई शाम आएगी वो छत जो घर का सब सेे पुर-सुकूँ और प्यारा हिस्सा थी किसे मा'लूम था वो ख़ुद-कुशी के काम आएगी — Charagh Sharma