Qaisar-ul-Jafri

Qaisar-ul-Jafri

@qaisar-ul-jafri

Qaisar-ul-Jafri shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Qaisar-ul-Jafri's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

तू इस तरह से मिरे साथ बे-वफ़ाई कर कि तेरे बा'द मुझे कोई बे-वफ़ा न लगे — Qaisar-ul-Jafri
दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है हम भी पागल हो जाएँगे ऐसा लगता है — Qaisar-ul-Jafri
शब की हवा से हार गई मेरे दिल की आग यख़-बस्ता शहर में कोई रद्द-ओ-बदल न था — Qaisar-ul-Jafri
तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे — Qaisar-ul-Jafri
घर लौट के रोएँगे माँ बाप अकेले में मिट्टी के खिलौने भी सस्ते न थे मेले में — Qaisar-ul-Jafri
ज़िंदगी भर के लिए रूठ के जाने वाले मैं अभी तक तिरी तस्वीर लिए बैठा हूँ — Qaisar-ul-Jafri
हवा ख़फ़ा थी मगर इतनी संग-दिल भी न थी हमीं को शमा' जलाने का हौसला न हुआ — Qaisar-ul-Jafri

Ghazal

काग़ज़ काग़ज़ धूल उड़ेगी फ़न बंजर हो जाएगा जिस दिन सूखे दिल के आँसू सब पत्थर हो जाएगा टूटेंगी जब नींद से पलकें सो जाऊँगा चुपके से जिस जंगल में रात पड़ेगी मेरा घर हो जाएगा ख़्वाबों के ये पंछी कब तक शोर करेंगे पलकों पर शाम ढलेगी और सन्नाटा शाख़ों पर हो जाएगा रात क़लम ले कर आएगी इतनी सियाही छिड़केगी दिन का सारा मंज़र-नामा बे-मंज़र हो जाएगा नाख़ुन से भी ईंट कुरेदें मिल-जुल कर हम-साए तो आँगन की दीवार न टूटे लेकिन दर हो जाएगा 'क़ैसर' रो लो ग़ज़लें कह लो बाक़ी है कुछ दर्द अभी अगली रुतों में यूँँ लगता है सब पत्थर हो जाएगा — Qaisar-ul-Jafri
सदियों तवील रात के ज़ानू से सर उठा सूरज उफ़ुक़ से झाँक रहा है नज़र उठा इतनी बुरी नहीं है खंडर की ज़मीन भी इस ढेर को समेट नए बाम-ओ-दर उठा मुमकिन है कोई हाथ समुंदर लपेट दे कश्ती में सौ शिगाफ़ हों लंगर मगर उठा शाख़-ए-चमन में आग लगा कर गया था क्यूँँ अब ये अज़ाब-ए-दर-बदरी उम्र भर उठा मंज़िल पे आ के देख रहा हूँ मैं आइना कितना ग़ुबार था जो सर-ए-रहगुज़र उठा सहरा में थोड़ी देर ठहरना ग़लत न था ले गर्द-बाद बैठ गया अब तो सर उठा दस्तक में कोई दर्द की ख़ुश्बू ज़रूर थी दरवाज़ा खोलने के लिए घर का घर उठा 'क़ैसर' मता-ए-दिल का ख़रीदार कौन है बाज़ार उजड़ गया है दुकान-ए-हुनर उठा — Qaisar-ul-Jafri
इतना सन्नाटा है बस्ती में कि डर जाएगा चाँद निकला भी तो चुप-चाप गुज़र जाएगा क्या ख़बर थी कि हवा तेज़ चलेगी इतनी सारा सहरा मिरे चेहरे पे बिखर जाएगा हम किसी मोड़ पे रुक जाएँगे चलते चलते रास्ता टूटे हुए पुल पे ठहर जाएगा बादबानों ने जो एहसान जताया उस पर बीच दरिया में वो कश्ती से उतर जाएगा चलते रहिए कि सफ़-ए-हम-सफ़राँ लंबी है जिस को रस्ते में ठहरना है ठहर जाएगा दर-ओ-दीवार पे सदियों की कोहर छाई है घर में सूरज भी जो आया तो ठिठर जाएगा फ़न वो जुगनू है जो उड़ता है हवा में 'क़ैसर' बंद कर लोगे जो मुट्ठी में तो मर जाएगा — Qaisar-ul-Jafri
दश्त-ए-तन्हाई में कल रात हवा कैसी थी देर तक टूटते लम्हों की सदा कैसी थी ज़िंदगी ने मिरा पीछा नहीं छोड़ा अब तक उम्र भर सर से न उतरी ये बला कैसी थी सुनते रहते थे मोहब्बत के फ़साने क्या क्या बूँद भर दिल पे न बरसी ये घटा कैसी थी क्या मिला फ़ैसला-ए-तर्क-ए-तअल्लुक़ कर के तुम जो बिछड़े थे तो होंटों पे दुआ कैसी थी टूट कर ख़ुद जो वो बिखरा है तो मालूम हुआ जिस से लिपटा था वो दीवार-ए-अना कैसी थी जिस्म से नोच के फेंकी भी तो ख़ुशबू न गई ये रिवायात की बोसीदा क़बा कैसी थी डूबते वक़्त भँवर पूछ रहा है 'क़ैसर' जब किनारे से चले थे तो फ़ज़ा कैसी थी — Qaisar-ul-Jafri
अहद-ए-जुनूँ में बैठे बैठे जो ग़ज़लें लिख डाली थीं हम को रुस्वा दुनिया भर को पागल करने वाली थीं आँखों में वो शाम का टुकड़ा अक्सर चुभता रहता है घर में आँधी जब आई थी शमएँ जलने वाली थीं चाँद सितारे टूट रहे थे ख़्वाबों की अँगनाई में आँख खुली तो देखा घर की सब दीवारें काली थीं चुटकी भर उम्मीद नहीं थी कासा ले कर क्या फिरते शहर-ए-वफ़ा की सारी गलियाँ अपनी देखी-भाली थीं प्यार का मौसम बीत चुका था बस्ती में जब पहुँचे हम लोगों ने फूलों के बदले तलवारें मँगवा ली थीं 'क़ैसर' दिल का हाल सुना कर जब यारों का मुँह देखा सब के चेहरे सूखे सूखे सब की आँखें ख़ाली थीं — Qaisar-ul-Jafri
दानिशवरों के बस में ये रद्द-ए-अमल न था मैं ऐसी तेग़ ले के उठा जिस में फल न था क्या दर्द टूट टूट के बरसा है रात भर इतना ग़ुबार तो मिरे चेहरे पे कल न था पथराव कर रहा है वो ख़ुद अपनी ज़ात पर क्या दिल के मसअले का कोई और हल न था शाख़ें लदी हुई थीं तो पत्थर न था नसीब पत्थर पड़े मिले तो दरख़्तों में फल न था शब की हवा से हार गई मेरे दिल की आग यख़-बस्ता शहर में कोई रद्द-ओ-बदल न था अब एक एक हर्फ़ से छनती है रौशनी तुम से मिले न थे तो ये हुस्न-ए-ग़ज़ल न था 'क़ैसर'! ज़मीर-ए-वक़्त को देखा कुरेद के सदियाँ रखी थीं दोश पे मुट्ठी में पल न था — Qaisar-ul-Jafri
ऐ वा'दा-शिकन ख़्वाब दिखाना ही नहीं था क्यूँँ प्यार किया था जो निभाना ही नहीं था इस तरह मेरे हाथ से दामन न छुड़ाओ दिल तोड़ के जाना था तो आना ही नहीं था अल्लाह न मिलने के बहाने थे हज़ारों मिलने के लिए कोई बहाना ही नहीं था देखो मेरी सर फोड़ के मरने की अदा भी वर्ना मुझे दीवाना बनाना ही नहीं था रोने के लिए सिर्फ़ मोहब्बत ही नहीं थी ग़म और भी थे दिल का फ़साना ही नहीं था न हम सही कहते न बनी दिल की कहानी या गोश-बर-आवाज़ ज़माना ही नहीं था 'क़ैसर' कोई आया था मेरी बख़िया-गरी को देखा तो गरेबाँ का ठिकाना ही नहीं था — Qaisar-ul-Jafri
ज़ेहन में कौन से आसेब का डर बाँध लिया तुम ने पूछा भी नहीं रख़्त-ए-सफ़र बाँध लिया बे-मकानी की भी तहज़ीब हुआ करती है उन परिंदों ने भी एक एक शजर बाँध लिया रास्ते में कहीं गिर जाए तो मजबूरी है मैं ने दामान-ए-दरीदा में हुनर बाँध लिया अपने दामन पे नज़र कर मिरे हाथों पे न जा मैं ने पथराओ किया तू ने समर बाँध लिया घर खुला छोड़ के चुपके से निकल जाऊँगा शाम ही से सर-ओ-सामान-ए-सहर बाँध लिया उम्र भर मैं ने भी साहिल के क़सीदे लिक्खे मेरे बच्चों ने भी इक रेत का घर बाँध लिया हार बे-दर्द हवाओं से न मानी 'क़ैसर' बादबाँ फेंक के क़दमों से भँवर बाँध लिया — Qaisar-ul-Jafri
दिन की बे-दर्द थकन चेहरे पे ले कर मत जा बाम-ओ-दर जाग रहे होंगे अभी घर मत जा मेरे पुरखों की विरासत का भरम रहने दे तू हवेली को खुला देख के अंदर मत जा बूँद भर दर्द सँभलता नहीं कम-ज़र्फ़ों से रख के तू अपनी हथेली पे समुंदर मत जा फूटने दे मिरी पलकों से ज़रा और लहू ऐ मिरी नींद अभी छोड़ के बिस्तर मत जा कुछ तो रहने दे अभी तर्क-ए-वफ़ा की ख़ातिर तुझ को जाना है तो जा हाथ झटक कर मत जा और कुछ देर ये मश्क़-ए-निगह-ए-नाज़ सही सामने बैठ अभी फेंक के ख़ंजर मत जा धूप क्या है तुझे अंदाज़ा नहीं है 'क़ैसर' आबले पाँव में पड़ जाएँगे बाहर मत जा — Qaisar-ul-Jafri
मैं पिछली रात क्या जाने कहाँ था दु'आओं का भी लहजा बे-ज़बाँ था हवा गुम-सुम थी सूना आशियाँ था परिंदा रात भर जाने कहाँ था हवाओं में उड़ा करते थे हम भी हमारे सामने भी आसमाँ था मिरी तक़दीर थी आवारागर्दी मिरा सारा क़बीला बे-मकाँ था मज़े से सो रही थी सारी बस्ती जहाँ मैं था वहीं शायद धुआँ था मैं अपनी लाश पर आँसू बहाता मुझे दुख था मगर इतना कहाँ था सफ़र काटा है कितनी मुश्किलों से वहाँ साया न था पानी जहाँ था कहाँ से आ गई ये ख़ुद-नुमाई वहीं फेंक आओ आईना जहाँ था मैं क़त्ल-ए-आम का शाहिद हूँ 'क़ैसर' कि बस्ती में मिरा ऊँचा मकाँ था — Qaisar-ul-Jafri
ये ज़िंदगी है कि आसेब का सफ़र है मियाँ चराग़ ले के निकलना बड़ा हुनर है मियाँ पता चले जो मोहब्बत का दर्द ले के चलो मिरे मकाँ की गली कितनी मुख़्तसर है मियाँ नहाएँगी मिरी ज़ौ में हज़ार-हा सदियाँ मैं वो चराग़ नहीं हूँ जो रात भर है मियाँ तुम्हारी रात पे इतना ही तब्सिरा है बहुत मकीं अँधेरे में हैं चाँदनी में घर है मियाँ लिखा है वक़्त ने सदियों सफ़र के बा'द उसे ये दौर झूट सही फिर भी मो'तबर है मियाँ मिलेगी राख न तुम को हमारे चेहरे पर बदन में रह के सुलगना बड़ा हुनर है मियाँ अब इंतिज़ार की ताक़त नहीं रही 'क़ैसर' कुछ और रोज़ न सोचा तो सब खंडर है मियाँ — Qaisar-ul-Jafri
डूबने वालो हवाओं का हुनर कैसा लगा ये किनारा ये समुंदर ये भँवर कैसा लगा पोंछते जाइए दामन से लहू माथे का सोचते जाइए दीवार को सर कैसा लगा हट गई छाँव मगर लोग वहीं बैठे हैं दश्त की धूप में जाने वो शजर कैसा लगा दर-ओ-दीवार हैं मैं हूँ मिरी तन्हाई है चाँदनी रात से पूछो मिरा घर कैसा लगा इस से पहले कभी पोंछे थे किसी ने आँसू उन का दामन तुझे ऐ दीदा-ए-तर कैसा लगा सहल थीं मरहला-ए-तर्क-ए-वफ़ा तक राहें इस से आगे कोई पूछे कि सफ़र कैसा लगा आँख से देख लिया तर्क-ए-वतन का मंज़र घर जहाँ छोड़ गए थे वो खंडर कैसा लगा वो मुझे सुन के बड़ी देर से चुप है 'क़ैसर' जाने उस को मिरी ग़ज़लों का हुनर कैसा लगा — Qaisar-ul-Jafri
दर-ओ-दीवार पे हिजरत के निशाँ देख आएँ आओ हम अपने बुज़ुर्गों के मकाँ देख आएँ आओ भीगी हुई आँखों से पढ़ें नौहा-ए-दिल आओ बिखरे हुए रिश्तों का ज़ियाँ देख आएँ टूटा टूटा हुआ दिल ले के फिरें गलियों में कच्ची मिट्टी के खिलौनों की दुकाँ देख आएँ रौशनी के कहीं आसार तो बाक़ी होंगे आओ पिघली हुई शम्ओं का धुआँ देख आएँ जिन दरख़्तों के तले रक़्स-ए-सबा होता था सूखे पत्तों का बरसना भी वहाँ देख आएँ अब फ़रिश्तों के सिवा कोई न आता होगा कौन देता है ख़राबों में अज़ाँ देख आएँ मुद्दतों ब'अद मुहाजिर की तरह आए हैं रूठ जाए न खंडर आओ मियाँ देख आएँ — Qaisar-ul-Jafri
न सवाल-ए-जाम न ज़िक्र-ए-मय उसी बाँकपन से चले गए तिरा ज़र्फ़ देख के तिश्ना-लब तिरी अंजुमन से चले गए कभी तू ने सोचा भी सुब्ह-ए-नौ कि तमाम रात गुज़ार के जिन्हें डस गई तिरी रौशनी वो कहाँ वतन से चले गए मुझे धुन कि काकुल-ए-ज़िंदगी जो बिखर गई है सँवार दूँ तुम्हें ग़म कि इश्क़ के तज़्किरे मिरे शेर-ओ-फ़न से चले गए तिरे गेसुओं से अज़ीज़ थीं जिन्हें काएनात की उलझनें तिरा ग़म समेट के रूह में तिरी अंजुमन से चले गए मिरे दिल को 'क़ैसर'-ए-बे-नवा कोई ग़म शिकस्त न दे सका कि उलझ के सैकड़ों हादसे मिरे बाँकपन से चले गए — Qaisar-ul-Jafri

Nazm

मेरे घर में झोंज बनाए गौरय्या का जोड़ा चोंच में ले कर आए जाए भूसा थोड़ा थोड़ा भूसे में कुछ तिनके भी हैं कुछ मटियाले पर नीले पीले उजले मैले भूरे काले पर बाग़ों बाग़ों हो कर आए अपना घर न भूले पहले वो रस्सी पर बैठे पल भर झूला झूले फिर अलमारी में उड़ कर जाए सीधे अपने कोने ग़ालिब का दीवान चुना है रहने को इन दो ने नीली नीली जिल्द पे जैसे फूल रखा हो कोई या काग़ज़ को रात समझ कर चाँद उगा हो कोई क़िस्मत वाले ठहरे उन के लाल गुलाबी पंजे उर्दू का इक शाइ'र आया उन के पाँव के नीचे चाँदी जैसे तख़्त पे सो कर गुज़रीं रातें उन की 'ग़ालिब'-साहिब सुनते होंगे शायद बातें उन की माज़ी की बुनियाद पे रक्खा है मुस्तक़बिल सब का आने वाले दौर में लोगों अटका है दिल सब का गौरय्या के इन ख़्वाबों को कैसे तोड़ा जाए कोई नुस्ख़ा और मँगा लें इस को छोड़ा जाए — Qaisar-ul-Jafri
ज़िंदगी तू मुझे किस मोड़ पे ले आई है ख़्वाब खुलते थे जहाँ बर्फ़ वहाँ छाई है सौ दरीचे हैं मगर शम्अ' किसी पर भी नहीं चाँद निकले मिरी रातों का मुक़द्दर भी नहीं क्या करूँँ क्या न करूँँ हाथ में पत्थर भी नहीं शीश-महलों को कोई ग़म भी नहीं डर भी नहीं लोग गूँगे हैं बयाबाँ में अज़ाँ कैसे हो लोग क़ातिल हैं इलाज-ए-ग़म-ए-जाँ कैसे हो लोग पत्थर हैं तो एहसास-ए-ज़ियाँ कैसे हो किस को फ़ुर्सत है जो पूछे कि मियाँ कैसे हो रात जब ख़त्म हुई थी तो सहर लगती थी रौशनी राह-गुज़र राह-गुज़र लगती थी ज़िंदगी कूचा-ए-जानाँ का सफ़र लगती थी अपनी मंज़िल कहीं जन्नत के उधर लगती थी कुछ भी आँखों में नहीं अश्क-ए-नदामत के सिवा कुछ भी दामन में नहीं दाग़-ए-मलामत के सिवा कुछ भी चेहरे पे नहीं गर्द-ए-मसाफ़त के सिवा अपनी दूकान में सब कुछ है मोहब्बत के सिवा — Qaisar-ul-Jafri