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Qaisar-ul-Jafri
SHER
तू इस तरह से मिरे साथ बे-वफ़ाई कर
कि तेरे बा'द मुझे कोई बे-वफ़ा न लगे
Qaisar-ul-Jafri
10
SHER
घर लौट के रोएँगे माँ बाप अकेले में
मिट्टी के खिलौने भी सस्ते न थे मेले में
Qaisar-ul-Jafri
9
GHAZAL
फिर मिरे सर पे कड़ी धूप की बौछार गिरी
मैं जहाँ जा के छुपा था वहीं दीवार गिरी
Qaisar-ul-Jafri
8
GHAZAL
तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे
मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे
Qaisar-ul-Jafri
7
SHER
दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है
हम भी पागल हो जाएँगे ऐसा लगता है
Qaisar-ul-Jafri
6
SHER
ज़िंदगी भर के लिए रूठ के जाने वाले
मैं अभी तक तिरी तस्वीर लिए बैठा हूँ
Qaisar-ul-Jafri
5
GHAZAL
टूटे हुए ख़्वाबों की चुभन कम नहीं होती
अब रो के भी आँखों की जलन कम नहीं होती
Qaisar-ul-Jafri
4
SHER
शब की हवा से हार गई मेरे दिल की आग
यख़-बस्ता शहर में कोई रद्द-ओ-बदल न था
Qaisar-ul-Jafri
3
SHER
हवा ख़फ़ा थी मगर इतनी संग-दिल भी न थी
हमीं को शमा' जलाने का हौसला न हुआ
Qaisar-ul-Jafri
2
SHER
1
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