Shahzan Khan Shahzan'

Shahzan Khan Shahzan'

@shahzankhanshahzan_

Shahzan Khan Shahzan' shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Shahzan Khan Shahzan''s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
  • Ghazal
आँखों से तेरे ख़्वाब के मंज़र निकाल के
हम सर्दियों में बैठे हैं चादर निकाल के

जब तू ही देखने को मयस्सर नहीं हमें
आँखों को रख न दें कहीं बाहर निकाल के
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Shahzan Khan Shahzan'
तू वापस लौट कर आए न आए
ये दरिया हर समय बहता मिलेगा
Shahzan Khan Shahzan'
इश्क़ अधूरा मौत की नींद सुलाता है
शुक्र मनाओ तुमको ज़िन्दा छोड़ दिया
Shahzan Khan Shahzan'
रहना पड़ता है उदासी के नगर में हमको
तब कहीं जाके ये अशआर हुआ करते हैं
Shahzan Khan Shahzan'
अपना जो बना ले वो नज़र ढूँढ़ रहे हैं
हम अपनी दुआओं में असर ढूँढ़ रहे हैं

ये कौन-सी दुनिया है जहाँ लोग ये सारे
रहने को तेरी बस्ती में घर ढूँढ़ रहे हैं
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Shahzan Khan Shahzan'
मुझको अफ़सोस मेरी सम्त न तू लौट सका
मैं कि देता रहा हर बार सदाएँ तुझको
Shahzan Khan Shahzan'
एक मुद्दत गुज़ार दी मैंने
वो भी आँखें तिरी बनाने में
Shahzan Khan Shahzan'
चौपाल अपने गाँव की वीरान हो गई
तुमने दरख़्त काट के अच्छा नहीं किया
Shahzan Khan Shahzan'
मैं जिंदगी के मसाइल से लड़ रहा था और
अचनाक उसको ज़रूरत पड़ी बिछड़ने की
Shahzan Khan Shahzan'
वो चाह कर भी तो रातों को सो नहीं पाते
सज़ा मिली है चराग़ों को इश्क़ करने की
Shahzan Khan Shahzan'
तुमने तो मेरे काम सब आसान कर दिये
खोने को मेरे पास में कुछ भी बचा नहीं
Shahzan Khan Shahzan'
आँखों से तेरे ख्वाब के मंज़र निकाल के
हम सर्दियों में बैठे हैं चादर निकाल के

जब तू ही देखने को मयस्सर नहीं हमें
आँखों को रख न दें कहीं बाहर निकाल के
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Shahzan Khan Shahzan'
जाने किस बात पे इस बार हुई है ग़ुस्सा
ज़िन्दगी खुल के कोई बात नहीं करती है
Shahzan Khan Shahzan'
ठहर गया हूँ मुहब्बत के उस क़बीले में
जहाँ से मुझको बहुत जल्द लौट जाना था
Shahzan Khan Shahzan'
उसने आबाद कहीं कर ली है अपनी दुनिया
ख़ुद को ये बात बताते हुए डर लगता है
Shahzan Khan Shahzan'
बस एक शिकवा है तुमसे के मुझसे मिलने कभी
हक़ीक़तों में नहीं ख़्वाब में तो आना था
Shahzan Khan Shahzan'
ज़िन्दगी पूछ न बैठे तिरे बारे में कहीं
तेरी तस्वीर बनाते हुए डर लगता है
Shahzan Khan Shahzan'
आँखों से तेरे ख़्वाब के मंज़र निकाल के
हम सर्दियों में बैठे हैं चादर निकाल के

जब तू ही देखने को मयस्सर नहीं हमें
आँखों को रख न दें कहीं बाहर निकाल के
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Shahzan Khan Shahzan'
ज़रा सा मुस्कुराओ रौशनी हो
बहुत तंग आ गये हम तीरगी से
Shahzan Khan Shahzan'
लोग पागल हैं जो समझते हैं
काफ़ी मुश्किल है मुस्कुराने में
Shahzan Khan Shahzan'

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