Shakeb Jalali

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Shakeb Jalali shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Shakeb Jalali's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

यही दीवार-ए-जुदाई है ज़माने वालो हर घड़ी कोई मुक़ाबिल में खड़ा रहता है — Shakeb Jalali
दिल सा अनमोल रतन कौन ख़रीदेगा 'शकेब' जब बिकेगा तो ये बे-दाम ही बिक जाएगा — Shakeb Jalali
भीगी हुई इक शाम की दहलीज़ पे बैठे हम दिल के सुलगने का सबब सोच रहे हैं — Shakeb Jalali
ये एक अब्र का टुकड़ा कहाँ कहाँ बरसे तमाम दश्त ही प्यासा दिखाई देता है — Shakeb Jalali
पहले तो मेरी याद से आई हया उन्हें फिर आइने में चूम लिया अपने-आप को — Shakeb Jalali
आज भी शायद कोई फूलों का तोहफ़ा भेज दे तितलियाँ मंडला रही हैं काँच के गुल-दान पर — Shakeb Jalali
दिल के वीराने में इक फूल खिला रहता है कोई मौसम हो मिरा ज़ख़्म हरा रहता है — Shakeb Jalali
वक़्त ने ये कहा है रुक रुक कर आज के दोस्त कल के बेगाने — Shakeb Jalali
मुझे गिरना है तो मैं अपने ही क़दमों में गिरूँ जिस तरह साया-ए-दीवार पे दीवार गिरे — Shakeb Jalali
सोचो तो सिलवटों से भरी है तमाम रूह देखो तो इक शिकन भी नहीं है लिबास में — Shakeb Jalali
प्यार की जोत से घर घर है चराग़ाँ वर्ना एक भी शम्अ' न रौशन हो हवा के डर से — Shakeb Jalali
तू ने कहा न था कि मैं कश्ती पे बोझ हूँ आँखों को अब न ढाँप मुझे डूबता भी देख — Shakeb Jalali

Ghazal

मौज-ए-ग़म इस लिए शायद नहीं गुज़री सर से मैं जो डूबा तो न उभरूँगा कभी सागर से और दुनिया से भलाई का सिला क्या मिलता आइना मैं ने दिखाया था कि पत्थर बरसे कितनी गुम-सुम मेरे आँगन से सबा गुज़री है इक शरर भी न उड़ा रूह की ख़ाकिस्तर से प्यार की जोत से घर घर है चराग़ाँ वर्ना एक भी शम्अ' न रौशन हो हवा के डर से उड़ते बादल के तआ'क़ुब में फिरोगे कब तक दर्द की धूप में निकला नहीं करते घर से कितनी रानाइयाँ आबाद हैं मेरे दिल में इक ख़राबा नज़र आता है मगर बाहरस वादी-ए-ख़्वाब में उस गुल का गुज़र क्यूँँ न हुआ रात भर आती रही जिस की महक बिस्तर से तान-ए-अग़्यार सुनें आप ख़मोशी से 'शकेब' ख़ुद पलट जाती है टकरा के सदा पत्थर से — Shakeb Jalali
ख़िज़ाँ के चाँद ने पूछा ये झुक के खिड़की में कभी चराग़ भी जलता है इस हवेली में ये आदमी हैं कि साए हैं आदमिय्यत के गुज़र हुआ है मिरा किस उजाड़ बस्ती में झुकी चटान फिसलती गिरफ़्त झूलता जिस्म मैं अब गिरा ही गिरा तंग-ओ-तार घाटी में ज़माने भर से निराली है आप की मंतिक़ नदी को पार किया किस ने उल्टी कश्ती में जलाए क्यूँँ अगर इतने ही क़ीमती थे ख़ुतूत कुरेदते हो अबस राख अब अँगेठी में अजब नहीं जो उगें याँ दरख़्त पानी के कि अश्क बोए हैं शब भर किसी ने धरती में मिरी गिरफ़्त में आ कर निकल गई तितली परों के रंग मगर रह गए हैं मुट्ठी में चलोगे साथ मिरे आगही की सरहद तक ये रहगुज़ार उतरती है गहरे पानी में मैं अपनी बे-ख़बरी से 'शकेब' वाक़िफ़ हूँ बताओ पेच हैं कितने तुम्हारी पगड़ी में — Shakeb Jalali
आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो चार गिरे जितने उस पेड़ के फल थे पस-ए-दीवार गिरे ऐसी दहशत थी फ़ज़ाओं में खुले पानी की आँख झपकी भी नहीं हाथ से पतवार गिरे मुझे गिरना है तो मैं अपने ही क़दमों में गिरूँ जिस तरह साया-ए-दीवार पे दीवार गिरे तीरगी छोड़ गए दिल में उजाले के ख़ुतूत ये सितारे मिरे घर टूट के बेकार गिरे क्या हवा हाथ में तलवार लिए फिरती थी क्यूँँ मुझे ढाल बनाने को ये छितनार गिरे देख कर अपने दर-ओ-बाम लरज़ जाता हूँ मिरे हम-साए में जब भी कोई दीवार गिरे वक़्त की डोर ख़ुदा जाने कहाँ से टूटे किस घड़ी सर पे ये लटकी हुई तलवार गिरे हम से टकरा गई ख़ुद बढ़ के अँधेरे की चटान हम सँभल कर जो बहुत चलते थे नाचार गिरे क्या कहूँ दीदा-ए-तर ये तो मिरा चेहरा है संग कट जाते हैं बारिश की जहाँ धार गिरे हाथ आया नहीं कुछ रात की दलदल के सिवा हाए किस मोड़ पे ख़्वाबों के परस्तार गिरे वो तजल्ली की शुआएँ थीं कि जलते हुए पर आइने टूट गए आइना-बरदार गिरे देखते क्यूँँ हो 'शकेब' इतनी बुलंदी की तरफ़ न उठाया करो सर को कि ये दस्तार गिरे — Shakeb Jalali
आया है हर चढ़ाई के बा'द इक उतार भी पस्ती से हम-कनार मिले कोहसार भी आख़िर को थक के बैठ गई इक मक़ाम पर कुछ दूर मेरे साथ चली रहगुज़ार भी दिल क्यूँँ धड़कने लगता है उभरे जो कोई चाप अब तो नहीं किसी का मुझे इंतिज़ार भी जब भी सुकूत-ए-शाम में आया तिरा ख़याल कुछ देर को ठहर सा गया आबशार भी कुछ हो गया है धूप से ख़ाकिस्तरी बदन कुछ जम गया है राह का मुझ पर ग़ुबार भी इस फ़ासलों के दश्त में रहबर वही बने जिस की निगाह देख ले सदियों के पार भी ऐ दोस्त पहले क़ुर्ब का नश्शा अजीब था मैं सुन सका न अपने बदन की पुकार भी रस्ता भी वापसी का कहीं बन में खो गया ओझल हुई निगाह से हिरनों की डार भी क्यूँँ रो रहे हो राह के अंधे चराग़ को क्या बुझ गया हवा से लहू का शरार भी कुछ अक़्ल भी है बाइस-ए-तौक़ीर ऐ 'शकेब' कुछ आ गए हैं बालों में चाँदी के तार भी — Shakeb Jalali
सोचता हूँ कि वो कितने मा'सूम थे क्या से क्या हो गए देखते-देखते मैं ने पत्थर से जिन को बनाया सनम वो ख़ुदा हो गए देखते-देखते हश्र है वहशत-ए-दिल की आवारगी हम से पूछो मोहब्बत की दीवानगी जो पता पूछते थे किसी का कभी लापता हो गए देखते-देखते हम से ये सोच कर कोई वा'दे करो एक वा'दा पे 'उम्रें गुज़र जाएँगी ये है दुनिया यहाँ कितने अहल-ए-वफ़ा बे-वफ़ा हो गए देखते-देखते ग़ैर की बात तस्लीम क्या कीजिए अब तो ख़ुद पर भी हम को भरोसा नहीं अपना साया समझते थे जिन को कभी वो जुदा हो गए देखते-देखते — Shakeb Jalali