mujhe girna hai to main apne hi qadmon mein girun | मुझे गिरना है तो मैं अपने ही क़दमों में गिरूँ

  - Shakeb Jalali

मुझे गिरना है तो मैं अपने ही क़दमों में गिरूँ
जिस तरह साया-ए-दीवार पे दीवार गिरे

  - Shakeb Jalali

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    पहले तो मेरी याद से आई हया उन्हें
    फिर आइने में चूम लिया अपने-आप को
    Shakeb Jalali
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    आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो चार गिरे
    जितने उस पेड़ के फल थे पस-ए-दीवार गिरे

    ऐसी दहशत थी फ़ज़ाओं में खुले पानी की
    आँख झपकी भी नहीं हाथ से पतवार गिरे

    मुझे गिरना है तो मैं अपने ही क़दमों में गिरूँ
    जिस तरह साया-ए-दीवार पे दीवार गिरे

    तीरगी छोड़ गए दिल में उजाले के ख़ुतूत
    ये सितारे मिरे घर टूट के बेकार गिरे

    क्या हवा हाथ में तलवार लिए फिरती थी
    क्यूँ मुझे ढाल बनाने को ये छितनार गिरे

    देख कर अपने दर-ओ-बाम लरज़ जाता हूँ
    मिरे हम-साए में जब भी कोई दीवार गिरे

    वक़्त की डोर ख़ुदा जाने कहाँ से टूटे
    किस घड़ी सर पे ये लटकी हुई तलवार गिरे

    हम से टकरा गई ख़ुद बढ़ के अँधेरे की चटान
    हम सँभल कर जो बहुत चलते थे नाचार गिरे

    क्या कहूँ दीदा-ए-तर ये तो मिरा चेहरा है
    संग कट जाते हैं बारिश की जहाँ धार गिरे

    हाथ आया नहीं कुछ रात की दलदल के सिवा
    हाए किस मोड़ पे ख़्वाबों के परस्तार गिरे

    वो तजल्ली की शुआएँ थीं कि जलते हुए पर
    आइने टूट गए आइना-बरदार गिरे

    देखते क्यूँ हो 'शकेब' इतनी बुलंदी की तरफ़
    न उठाया करो सर को कि ये दस्तार गिरे
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    Shakeb Jalali
    दिल के वीराने में इक फूल खिला रहता है
    कोई मौसम हो मिरा ज़ख़्म हरा रहता है
    Shakeb Jalali
    आया है हर चढ़ाई के बा'द इक उतार भी
    पस्ती से हम-कनार मिले कोहसार भी

    आख़िर को थक के बैठ गई इक मक़ाम पर
    कुछ दूर मेरे साथ चली रहगुज़ार भी

    दिल क्यूँ धड़कने लगता है उभरे जो कोई चाप
    अब तो नहीं किसी का मुझे इंतिज़ार भी

    जब भी सुकूत-ए-शाम में आया तिरा ख़याल
    कुछ देर को ठहर सा गया आबशार भी

    कुछ हो गया है धूप से ख़ाकिस्तरी बदन
    कुछ जम गया है राह का मुझ पर ग़ुबार भी

    इस फ़ासलों के दश्त में रहबर वही बने
    जिस की निगाह देख ले सदियों के पार भी

    ऐ दोस्त पहले क़ुर्ब का नश्शा अजीब था
    मैं सुन सका न अपने बदन की पुकार भी

    रस्ता भी वापसी का कहीं बन में खो गया
    ओझल हुई निगाह से हिरनों की डार भी

    क्यूँ रो रहे हो राह के अंधे चराग़ को
    क्या बुझ गया हवा से लहू का शरार भी

    कुछ अक़्ल भी है बाइस-ए-तौक़ीर ऐ 'शकेब'
    कुछ आ गए हैं बालों में चाँदी के तार भी
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    Shakeb Jalali
    ख़िज़ाँ के चाँद ने पूछा ये झुक के खिड़की में
    कभी चराग़ भी जलता है इस हवेली में

    ये आदमी हैं कि साए हैं आदमिय्यत के
    गुज़र हुआ है मिरा किस उजाड़ बस्ती में

    झुकी चटान फिसलती गिरफ़्त झूलता जिस्म
    मैं अब गिरा ही गिरा तंग-ओ-तार घाटी में

    ज़माने भर से निराली है आप की मंतिक़
    नदी को पार किया किस ने उल्टी कश्ती में

    जलाए क्यूँ अगर इतने ही क़ीमती थे ख़ुतूत
    कुरेदते हो अबस राख अब अँगेठी में

    अजब नहीं जो उगें याँ दरख़्त पानी के
    कि अश्क बोए हैं शब भर किसी ने धरती में

    मिरी गिरफ़्त में आ कर निकल गई तितली
    परों के रंग मगर रह गए हैं मुट्ठी में

    चलोगे साथ मिरे आगही की सरहद तक
    ये रहगुज़ार उतरती है गहरे पानी में

    मैं अपनी बे-ख़बरी से 'शकेब' वाक़िफ़ हूँ
    बताओ पेच हैं कितने तुम्हारी पगड़ी में
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    Shakeb Jalali

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