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बद-क़िस्मती को ये भी गवारा न हो सका
हम जिस पे मर मिटे वो हमारा न हो सका
हम जिस पे मर मिटे वो हमारा न हो सका
रह तो गई फ़रेब-ए-मसीहा की आबरू
हर चंद ग़म के मारों का चारा न हो सका
ख़ुश हूँ कि बात शोरिश-ए-तूफ़ाँ की रह गई
अच्छा हुआ नसीब किनारा न हो सका
बे-चारगी पे चारागरी की हैं तोहमतें
अच्छा किसी से इश्क़ का मारा न हो सका
कुछ इश्क़ ऐसी बख़्श गया बे-नियाज़ियाँ
दिल को किसी का लुत्फ़ गवारा न हो सका
फ़र्त-ए-ख़ुशी में आँख से आँसू निकल पड़े
जब उन का इल्तिफ़ात गवारा न हो सका
उल्टी तो थी नक़ाब किसी ने मगर 'शकेब'
दा'वों के बावजूद नज़ारा न हो सका
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सोचता हूँ कि वो कितने मा'सूम थे क्या से क्या हो गए देखते-देखते
मैं ने पत्थर से जिन को बनाया सनम वो ख़ुदा हो गए देखते-देखते
मैं ने पत्थर से जिन को बनाया सनम वो ख़ुदा हो गए देखते-देखते
हश्र है वहशत-ए-दिल की आवारगी हम से पूछो मोहब्बत की दीवानगी
जो पता पूछते थे किसी का कभी लापता हो गए देखते-देखते
हम से ये सोच कर कोई वा'दे करो एक वा'दा पे 'उम्रें गुज़र जाएँगी
ये है दुनिया यहाँ कितने अहल-ए-वफ़ा बे-वफ़ा हो गए देखते-देखते
ग़ैर की बात तस्लीम क्या कीजिए अब तो ख़ुद पर भी हम को भरोसा नहीं
अपना साया समझते थे जिन को कभी वो जुदा हो गए देखते-देखते
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पहले तो मेरी याद से आई हया उन्हें
फिर आइने में चूम लिया अपने-आप को
फिर आइने में चूम लिया अपने-आप को
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प्यार की जोत से घर घर है चराग़ाँ वर्ना
एक भी शम्अ' न रौशन हो हवा के डर से
एक भी शम्अ' न रौशन हो हवा के डर से
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आज भी शायद कोई फूलों का तोहफ़ा भेज दे
तितलियाँ मंडला रही हैं काँच के गुल-दान पर
तितलियाँ मंडला रही हैं काँच के गुल-दान पर
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