
आँखों से तेरे ख़्वाब के मंज़र निकाल के
हम सर्दियों में बैठे हैं चादर निकाल के
जब तू ही देखने को मुयस्सर नहीं हमें
आँखों को रख न दें कहीं बाहर निकाल के
— Shahzan Khan Shahzan'
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