तेरे आँसू निकल रहे हैं दोस्त

ज़ख़्म सीने में पल रहे हैं दोस्त

तुम ही रक्खो ये फूल का बिस्तर
हम तो काँटों पे चल रहे हैं दोस्त

देख कर मुझ को दूर जाते हुए
अपनी आँखों को मल रहे हैं दोस्त

तेरे दिल के मकाँ में रहने को
ख़ुद को अब हम बदल रहे हैं दोस्त

मेरा महताब देखने के लिए
सारे तारे मचल रहे हैं दोस्त

हैं वफ़ाओं के रास्ते आसान
हम तो यूँही फिसल रहे हैं दोस्त

इक महकते गुलाब की ख़ातिर
सारी कलियाँ कुचल रहे हैं दोस्त

— Shahzan Khan Shahzan'

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