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उसे अपना कहा बस आजमाइश ही नहीं माँगी
ख़ुदा माँगा तो पर उस की नवाज़िश ही नहीं माँगी
ख़ुदा माँगा तो पर उस की नवाज़िश ही नहीं माँगी
महीने भर से प्यासा छटपटाता मर गया था मैं
वो बादल आए तो थे मैं ने बारिश ही नहीं माँगी
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एक दिन हम कर्ण भी बन जाएँ लेकिन
मित्र कह कर कोई दुर्योधन पुकारे
मित्र कह कर कोई दुर्योधन पुकारे
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है वक़्त का कोई तक़ाज़ा या जुनूँ बाक़ी मेरा
मैं लिख रहा हूँ जिस्म पर जब तक है ख़ूँ बाक़ी मेरा
मैं लिख रहा हूँ जिस्म पर जब तक है ख़ूँ बाक़ी मेरा
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वो थी ग़ज़ल सो ध्यान से लोगों ने सब सुना
मैं नुक़्ता था जो ठीक पढ़ा भी नहीं गया
मैं नुक़्ता था जो ठीक पढ़ा भी नहीं गया
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कहाँ ख़ुद पे फिर मेरा क़ाबू चलेगा
वो आवाज सुनली तो जादू चलेगा
वो आवाज सुनली तो जादू चलेगा
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ज़ख़्म के आलम पे ही पर्दा रखा है
आँच पर पलता हुआ सपना रखा है
आँच पर पलता हुआ सपना रखा है
उठ चली है अजनबी हर्फ़-ए-तमन्ना
ज़ेहन और दिल उस ने ही महका रखा है
दूर देखा था जिसे नज़दीक है वो
शहर ने गाँवों को यूँ अपना रखा है
वो अजल की शाम मौला नाम तेरे
ये अजल के नाम वो चेहरा रखा है
तुम भी अन्वेषी हो उन ज़ुल्फ़ों के क़ैदी
जिन अजब तस्वीरों से रिश्ता रखा है
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