तमन्ना थी तेरे साथ देखूँ मैं शहर तेरा
    मगर समुंदर के शोर में ख़ुद को तन्हा पाया
    Shams Amiruddin
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    सुनो न जान मेरी आज शाम तुम ठहर जाओ
    शराब की मिरी ये तिश्नगी बुझा के घर जाओ
    Shams Amiruddin
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    मुस्कान उसने छीन ली लब से मिरे
    मैं धुन सुनाया करता था जिस प्यार के
    Shams Amiruddin
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    सरसरी सी ये बात जा-गुज़ीं है
    के हया उन में थोड़ी भी नहीं है

    लोग वो ख़ाक होंगे ग़ैरतमंद
    जो वफ़ादार इक ज़रा नहीं है
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    Shams Amiruddin
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    इक ख़ता पर मिरी ख़फ़ा हो गए
    दिखा कर ख़्वाब वो जुदा हो गए

    रूठ कर बिछड़े इस तरह से वो
    इश्क़ में यार भी ख़ुदा हो गए

    बेवफ़ा लड़की की मोहब्बत में
    देख लो हम भी क्या से क्या हो गए

    लोग क्या अपने भी मुसीबत में
    वक़्त के रहते गुम-शुदा हो गए
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    Shams Amiruddin
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    हम काट लेंगे हिज्र की ये रातें भी
    पहले मोहब्बत भी ज़रा हो तो सही

    है मुख़्तलिफ़ मेरी कहानी औरों से
    तुम दर्द-ए-दिल को मेरे समझो तो सही
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    Shams Amiruddin
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    मोहब्बत जो समझते हैं
    वहीं हम को समझते हैं

    फ़क़त अब हम हक़ीकत भी
    यूँ ख़्वाबों को समझते हैं
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    Shams Amiruddin
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    हाँ ये लहजा तिरा बता रहा हैं
    पहले सी बात अब नहीं तुझ में

    ख़ुद को तुम क्यों बदलती जा रही हो
    ऐसा भी क्या ही मिल गया है तुम्हें
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    Shams Amiruddin
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    दौलत भी शोहरत भी निछावर तुझ पे सब
    रस्म-ए-मोहब्बत तुम निभाओ तो सही
    Shams Amiruddin
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    अहद-ए-वफ़ा और झूट मैं सब सीख लूँ
    रस्म-ए-मोहब्बत तुम सिखाओ तो सही
    Shams Amiruddin
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