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    खेलना ही मत कभी शतरंज घर में
    चाल चलना पड़ता है अपनों के आगे
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    बातें करो तो बोलती है बोलते हो तुम बहुत
    उसने किनारे पे से लहरें देखी गहराई नहीं
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    कोई भी चीज़ रख कर दो मिनट में भूल जाता हूँ
    मगर इस ज़ेहन में जो याद है जाती नहीं है क्यों
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    दौर ऐसा आया है घर के बड़े अब
    माँगते हैं मौत पोते के ब-जाए
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    ख़बर आई है पीएचडी मुकम्मल हो गई लेकिन
    नफ़ा' क्या आजतक जो तुम मिरी आँखें न पढ़ पाई
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    बनाया छत कि बेटी आसमाँ देखे
    गई वो कूद सूरज के लिए पगली
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    तू कभी भी मिला ही नहीं था मुझे,
    छात्र हैं हम गणित के रखा मानकर
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    कभी क्या याद आता है कि कोई याद करता है
    भुला देंगे तरीक़े से कभी आए भुलाने पर
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    वक़्त क्यूँ है लगा पूछ मत
    बात ये है पहुँच हम गये
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    किसी दिन ढूँढने का मन करे तो बस वहीं आना
    सभी जाते कहां है ग़ौर करना ख़ुदकुशी करके
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