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मुझको अब चैन से जीने की तमन्ना ही नहींबस ये ख्वाहिश है कि अब चैन से मर जाऊँ मैं
दिल ए मरीज़ ने दिल से तुझे पुकारा हैतू मेरी ज़ीस्त का अब आख़िरी सहारा है
सर उठा सकता नहीं कोई यज़ीदी हश्र तककर दिया कुछ इतना ख़म बातिल का सर अब्बास ने
दुनिया की नेमतों से है बेज़ार ज़िंदगीअब देखती है जीने के आसार ज़िंदगी
कोई भी ख़्वाब मुकम्मल नहीं होने देतीज़िंदगी चैन से मुझको नहीं सोने देती
तुम्हारी दीद की ख़्वाहिश लिए वो बैठे हैंतुम्हारी दीद ही बीमार की शिफ़ा ठहरी
उनके बग़ैर दिल नहीं लगता मकान मेंमाँ गर नहीं तो कुछ भी नहीं है जहान में
कहने वाले तो कह के रहते हैंउनका सोचेंगे मर ही जाएँगे
दिल में वहशत है एक उलझन हैआख़िरी रात तो नहीं है मेरी
हमको हसरत ही रही कोई हमारा होताकुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होतादिल ने देखा ही नहीं और किसी की जानिबवरना इस दौर में कोई तो हमारा होता