याद उसे मेरी तब तब आती होगी
इस रस्ते से वो जब भी जाती होगी
इस रस्ते से वो जब भी जाती होगी
मैं तो हार गया सब कुछ अपना उस पे
सोच यही वो कितना इतराती होगी
कितना पागल था मैं पीछे उस के वो
सखियों से हँस हँस कर बतलाती होगी
कैसी लगती होगी वो आईने में
जब कंघी से वो बाल बनाती होगी
तन्हाई में आती होगी याद मिरी
तो ग़ज़ले सब मेरी वो गाती होगी
याद लगाए दिल से बैठा है जिस की
वो दिल से तेरी याद मिटाती होगी
ख़याल मेरा जब उस को आता होगा
कैसे दिल को वो तब समझाती होगी
रूठा है जिस की ख़ातिर तू हयात से
वो हयात-ए-नौ की रस्म निभाती होगी
ज़िक्र किसी आशिक़ का जब आता होगा
किस का चेहरा वो दिल में पाती होगी
चलना है साथ तिरे कोई हर्ज नहीं
रुक जा ऐ मौत ज़रा वो आती होगी
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क़िस्मत ख़ुदा ने मेरी जो पहले पहल लिखी
उस ने ग़म-ए-फ़िराक़ ही मेरी मज़ल लिखी
उस ने ग़म-ए-फ़िराक़ ही मेरी मज़ल लिखी
बातों का उन सभी न असर उन पे था कभी
बातें सभी जो उन पे ही कर के अमल लिखी
याराँ पिया है ज़हर मिरा इश्क़ में अभी
मैं ने दुखों से इश्क़ के पहली ग़ज़ल लिखी
लाया है अश्क तेरी ये आँखों में वो 'अनुज'
आँखें वो जिस की तू ने कभी थी कँवल लिखी
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तो न आया असर उस की इबादत में
हार के रो रहा है वो मुहब्बत में
हार के रो रहा है वो मुहब्बत में
हो गईं सच सभी बातें कहावत की
छोड़ के सब चले जाते हैं गु़र्बत में
याद आते नहीं हो तुम कभी हम को
बस यही याद अब करते हैं फु़र्क़त में
बात ये इक दिल-ए-नादाँ समझ ले तू
इश्क़ रहता नहीं है सब की क़िस्मत में
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एक ही काम रोज़ कर रहे हैं हम
जीने की आरज़ू में मर रहे हैं हम
जीने की आरज़ू में मर रहे हैं हम
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है मुहब्बत खेल वो जो खेलना तुझ को पड़ेगा
ज़िन्दगी में ज़िन्दगी को सामने नीलाम कर के
इश्क़ तुझ से क्यूँ नहीं करती है वो बस छोड़ दे अब
जानकर भी क्या मिलेगा यूँ तुझे कुहराम कर के
कितने नादाँ हैं वो जो ये सोचते हैं बस हमेशा
ज़िन्दगी हम भी जिएँगे फिर कभी सब काम कर के
हैं गिले-शिकवे 'अनुज' उस शख़्स से तुम को बहुत ना
कर गया मशहूर तुम को ख़ुद को वो गुमनाम कर के
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इश्क़ हम को कभी रास आया नहीं
दर्द ही के सिवा कुछ भी पाया नहीं
दर्द ही के सिवा कुछ भी पाया नहीं
ख़्वाब में रात मुझ को मिली थी वो कल
ख़्वाब में भी मैं कुछ बोल पाया नहीं
इश्क़ करता हूँ मैं ये पता है उसे
इश्क़ है तुम ही से ये जताया नहीं
मौत आसान थी ज़िन्दगी से अनुज
ज़िन्दगी ने कभी ये बताया नहीं
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दिल यार न टूटा जिस का जवानी में
क्या ख़ाक मज़ा है उस की कहानी में
क्या ख़ाक मज़ा है उस की कहानी में
जो दूर चले जाते हैं बहुत हम से
बस रहती है उन की याद निशानी में
जीना है अगर तुझ को तो फ़रेबी बन
नुक़सान यहाँ है साफ़ बयानी में
ख़ामोश हूँ तो अब ये न समझना तुम
बातें नहीं आती तेरी ज़बानी में
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जब झलक मेरी किसी और में पाई होगी
बे-वफ़ा तुझ को मेरी याद तो आई होगी
बे-वफ़ा तुझ को मेरी याद तो आई होगी
छोड़कर मुझ को तड़पता हुआ जाने वाले
किस तरह दुनिया कोई और बसाई होगी
हाल जब मेरा किसी ने भी सुनाया होगा
आँख भी तेरी नमी से छलक आई होगी
यार ने जब कभी दिल तेरा दुखाया होगा
मेरी तकलीफ़ तुझे तब समझ आई होगी
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