मुक़र्रर दिन नहीं तो लम्हा-ए-इमकान में आओ
अगर तुम मिल नहीं सकती तो मेरे ध्यान में आओ
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महीनों तक रहा करते थे सब मेहमान आँखों में,
मगर अब ख़्वाब भी आते नहीं वीरान आँखों में
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ज़ब्त करो गर ग़म के बादल छाए हैं,
रक़्स करो के बारिश आने वाली है
रक़्स करो के बारिश आने वाली है
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पहले पहले दिल लगता था अब तो सिर्फ़ दिमाग़ लगे
क्या मतलब ऐसे रिश्ते पर फूल खिले या दाग़ लगे
क्या मतलब ऐसे रिश्ते पर फूल खिले या दाग़ लगे
इस
में ऐसी तारीक़ी है जिस से सब घबराते हैं
दश्त वगरना सब को अपने घर का गुलशन-बाग़ लगे
मुमकिन है तुम को पहले से और ज़्यादा उलझा दे
जो दिखने में इस गुत्थी का सब से अहम सुराग़ लगे
मुझ से पहले इस के होंठो को गीला कर दे साक़ी
मुझ से उम्दा प्यासा तो ये मय का ख़ुश्क अयाग़ लगे
एक नज़र पड़ जाए उस की जिस की ख़ातिर पहना है
फिर चाहे तो इस कुर्ते में आग लगे या दाग़ लगे
उस की आँखें पाकीज़ा हैं इतनी पाकीज़ा 'दर्पन'
वो देखे तो उस को काला पत्थर एक चराग़ लगे
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दोस्त नहीं थे लड़ते भी थे या'नी दुश्मन थे
कुछ दिन पहले हम दोनों भी जानी दुश्मन थे
कुछ दिन पहले हम दोनों भी जानी दुश्मन थे
फिर इक दिन जब मैं ने लावा देखा चौक गया
मुझ को ये लगता था आग और पानी दुश्मन थे
दोस्त मिले हैं तो मुश्किल ने दस्तक दी है अब
जब जीने में होती थी आसानी, दुश्मन थे
बेहोशी में सोच रहे थे जीत गए हम जंग
आँख खुली तो हुई बड़ी हैरानी.. दुश्मन थे
दर्पन ने लोगों से या तो इश्क़ किया या बैर
दोस्त नहीं थे इस के सीधे मानी - दुश्मन थे
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बला की तिश्नगी आँखों में ले कर फिर रही है वो
जिसे भी देख लेती है उसे फिर प्यास लगती है
उसी की शोख़ियों से बाग़ का हर फूल जलता है
उसी की उँगलियों पे तितलियों की क्लास लगती है
मेरी नज़रों के चारों सम्त उस की याद बिखरी है
मुझे अब हर घड़ी उस से मिलन की आस लगती है
उसी ने हिज्र को भी वस्ल जैसा कर दिया 'दर्पन
वो जितना दूर होती है, वो उतना पास लगती है
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